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नरसी मेहता व नानी बाई का मायरा कथा ग्रंथ की शोभायात्रा निकाली

3 वर्ष पहले
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नानी बाई रो मायरो कथा के पहले दिन बुधवार को चित्तौड़गढ़ के रामस्नेही संत दिग्विजय राम ने कहा कि एक पल की भक्ति में कई जन्मों के पापों का नाश करने का सामर्थ होता है। भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है तो कीर्तन बन जाता है। सफर में प्रवेश करती है तो तीर्थयात्रा बन जाती है। जब भक्ति घर में प्रवेश करती है तो मंदिर बन जाता है। भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है तो कार्य कर्म बन जाता है, और भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है तो व्यक्ति मानव बन जाता है।

महलों का चौक सुदर्शन स्टेडियम में पौंडरिक परिवार की ओर से नानी बाई रो मायरो कथा का शुभारंभ बुधवार शाम हुआ। भक्त नरसी मेहता और नानी बाई का मायरा कथा ग्रंथ की शोभायात्रा निकाली गई। रमताराम महाराज के शिष्य दिग्विजय राम ने संगीतमय कथा में कहा कि मन में संतत्व होना चाहिए। भक्त नरसी मेहता कोई वेशधारी संत नहीं थे, बल्कि एक साधारण गृहस्थ थे। संत वृत्ति संतत्व के गुण से आती है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर संतत्व के गुण होते हैं। हर व्यक्ति में अच्छाई और बुराई हैं, बस उन्हें अच्छाई को पास रखने और बुराई को दूर करने का प्रयास करना है। बुराई दूर होते ही संतत्व के गुण प्रकट होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि नरसी मेहता का जन्म जूनागढ़ के पास तलाजा गांव में हुआ था। उनके पिता कृष्ण दामोदर वडनगर के नागर वंशी कुलीन ब्राह्मण थे। उनका अवसान हो जाने पर नरसी को कष्टमय जीवन व्यतीत करना पड़ा। एक कथा के अनुसार वे आठ वर्ष तक गूंगे रहे। किसी कृष्ण भक्त साधु की कृपा से उन्हें वाणी का वरदान प्राप्त हुआ। साधु संग उनका व्यसन था। उन्हें गृहत्याग भी करना पड़ा। विवाह के बाद प|ी माणिक बाई से कुंवर बाई तथा शामलदास नामक दो संतानें हुई। कृष्ण भक्त होने से पूर्व उनके शैव होने के प्रमाण मिलते हैं। गोपीनाथ महादेव की कृपा से ही उन्हें कृष्णलीला के दर्शन हुए। जिसने उनके जीवन को नई दिशा में मोड़ दिया। पौंडरिक परिवार ने ग्रंथ पूजन किया।



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