रोज भोजन से पहले डालते हैं दाना-पानी, ताकि भूखे-प्यासे न रहें पंछी
दादा के समय से चले आ रहे सेवा कार्य में आज पोते भी देते हैं साथ
भास्कर संवाददाता | शाजापुर
अधिकांश लोग गर्मी शुरू होने पर ही पशु-पक्षियों के लिए अन्न-जल की व्यवस्था करते हैं। बारिश होते ही उनका ध्यान इनसे हट जाता है, लेकिन शहर में कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें मौसमों से काेई फर्क नहीं पड़ता। इस नेक काम के लिए इनके आंगन में हर दिन खास रहता है। परिवारों के ये सदस्य अपने भोजन से पहले सुबह होते ही अपने घर की छत पर ज्वार, चावल, दाल, दाने बिखेर देते हैं। मिट्टी के सकाेरे व इसके जैसे बड़े पात्रों में पानी भरकर पास ही रोटी के टुकड़े भी रख देते हैं। उद्देश्य यही कि दाने-पानी की तलाश में कोई पंछी उड़ता हुआ आशियाने पर आए तो यहां से भूखा-प्यासा न लौटे।
परिवार के सदस्य अपने राशन के अलावा पक्षियों के लिए अलग से सालभर या हर महीने एक निश्चित मात्रा में अनाज सुरक्षित रखते हैं। सेवा का यह जज्बा इनकी जिंदगी का पहलू बन गया है। कुछ परिवार तो ऐसे हैं, जहां दादा के समय से चली आ रही पंछियों को दाना-पानी डालने की आदत में आज दादाजी के नहीं होने के बाद भी पोते परिवारजन का साथ दे रहे हैं। इन परिवारजन ने किसी समय पक्षियों को दाने-पानी के लिए लड़ते और पलायन करते देखा था, तभी से इनके संरक्षण की दिशा में यह बीड़ा उठाया। इनके इस जज्बे से हर दिन यहां कई बेजुबानों को आहार मिल रहा है।
हर साल एक क्विंटल ज्वार पक्षियों को खिला रहे
नीमवाड़ी क्षेत्र के रहवासी जगदीशचंद्र शर्मा व प|ी गायत्री देवी पिछले 25 साल से हर दिन घर की छत पर पंछियों के लिए दाने-पानी की व्यवस्था करते आ रहे हैं। सुबह-शाम दोनों टाइम छत पर ज्वार के दाने डालते हैं। मिट्टी के सकोरों में पानी भरा रहता है। परिंदों का दाना-पानी रखने के बाद परिवारजन भोजन करते हैं। शर्मा के अनुसार इस सेवा के लिए हर साल करीब 100 किलो ज्वार के दाने लगते हैं, जिनकी व्यवस्था अलग से ही की जाती है। पोता कार्तिक भी दादा-दादी के साथ यह काम कर रहा है।
दादाजी ने की थी शुरुआत, अब पोता भी रख रहा ध्यान
श्री सत्यसांई सेवा समिति के संस्थापक रहे स्व. हरिसिंह खींची ने सालों पहले अपने घर की छत पर पंछियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था शुरू की थी। इससे हर दिन यहां दाने-पानी की तलाश में आने वाले पंछियों से लेकर बंदरों तक का पेट भरता था। इस सेवा कार्य में उनका साथ दोनों बेटे गजेंद्र व ब्रजेंद्रसिंह भी देते रहे। वर्ष 2015 में खींची के निधन के बाद अब पोता शिवेंद्र भी इस बात का पूरा ध्यान रख रहा है। शिवेंद्र भी दिनचर्या के साथ घर की छत पर पंछियों के लिए दाने-पानी की व्यवस्था करना नहीं भूलता। हर महीने 10 किलो ज्वार, चावल इन वन्य प्राणियों को परिवारजन खिलाते हैं।
अनाज के साथ रोटी-पानी रखना नहीं भूलते परिवारजन
सोमवारिया में रहने वाले पाठक परिवार के सदस्य हर मौसम में हर दिन ही घर की छत पर पंछियों के लिए अनाज के साथ रोटी-पानी रखना नहीं भूलते। परिवार के बड़े बेटे एडवोकेट प्रदीप पाठक बताते हैं पिता स्व. रमेशचंद्रजी ने 1996 से कौवे, विभिन्न प्रजातियों के पंछियों की देखभाल के लिए यह काम शुरू किया था। पाठक के निधन के बाद आज बेटे प्रदीप व पोते हर्षित, निखिल भी सेवा के इस काम को लगन से कर रहे हैं। प्रदीप कहते हैं सुबह भोजन तैयार होते ही सबसे पहले घर की छत पर कौवे, पंछियों के लिए रोटी व जलपात्र में पानी भरकर रखा जाता है।