सामान्य मरीजों के साथ भर्ती हो रहे टीबी रोगी, संक्रमण फैलने का बना खतरा
जिला अस्पतालों में अव्यवस्थाओं के बीच में मरीजों को परेशानी उठानी पड़ रही है, जिसमें मरीजों को खुद ही ट्रीटमेंट के लिए स्टॉफ नर्स रूम तक जाना पड़ रहा है। जबकि सामान्य वार्डों व बच्चे एवं बूढ़ों के बीच में टीबी की गंभीर बीमारी से ग्रसित मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। जिससे सामान्य मरीजों में इसके संक्रमण का खतरा भी बढ़ रहा है। अस्पताल में पहली मंजिल पर कुपोषित व आदिवासी बच्चों के साथ अन्य बच्चों को भी रखा गया है, इन्हीं के बीच में टीबी रोगियों को भी भर्ती किया जा रहा है।
जिला अस्पताल में सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है, न ही डॉक्टर समय पर बैठ रहे है और नहीं ठीक से इलाज मिल पा रहा है। अस्पताल में मरीजों ट्रीटमेंट के लिए स्टॉफ रूम तक जाना पड़ता है। जबकि नर्स मरीज को मौके पर पहुंचकर इंजेक्शन व ड्रिप लगाने नहीं जाती है। स्टॉफ नर्स के ड्यूटी रूम में ही जाकर मरीजों को यह सब कराना पड़ता है। जबकि मरीजों के परिजनों को ड्रिप लगवाने के बाद खुद ही बेड तक लाना पड़ता है। अस्पताल में यह अव्यवस्थाएं ही नहीं है बल्कि, सामान्य मरीजों के बीच में टीबी से ग्रसित गंभीर मरीजों को भी भर्ती कर दिया जाता है। जबकि डॉक्टर खुद जानते है कि टीबी एक संक्रमण बीमारी है, जिसका कीटाणु हवा के साथ फैलता है। लेकिन इसके बाद भी इन बातों का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है। अस्पताल में अब तक टीबी रोगियों के लिए अलग से वार्ड नहीं बनाया गया है। जिससे यह परेशानी मरीजों को उठानी पड़ रही है। लगभग दो साल पहले अस्पताल प्रबंधन ने रैन बसेरे को बंद करते हुए उसमें टीबी वार्ड शिफ्ट कर दिया था, लेकिन कुछ महीनों बाद ही इसे भी बंद कर दिया और टीबी के मरीजों को फिर से सामान्य मरीजों के बीच भर्ती कर दिया गया। क्योंकि स्टॉफ नर्स व डॉक्टर अस्पताल परिसर में थोड़ी ही दूरी पर बनाए गए इस टीबी वार्ड में जाना ही नहीं चाहते थे। नतीजा सामान्य वार्ड में ही मरीजों के बीच टीबी रोगियों को फिर से भर्ती किया जाने लगा।
अस्पताल में साफ-सफाई का भी ध्यान पूरी तरह से नहीं रखा जा रहा है। जिसमें वार्डों में गंदगी फैली हुई और गंदगी के बीच में ही मरीज भर्ती पड़े हुए है। दूसरों को सफाई का सबक सिखाने वाला अस्पताल प्रबंधन ही सफाई पर ध्यान नहीं दे रहा है। नतीजा वार्डों में गंदगी के साथ दुर्गंध भी उड़ती है, जिससे कई लोग उल्टी की बीमारी का शिकार हो जाते है। जबकि अस्पतालों की सफाई नियमानुसार दो समय होने चाहिए, पर अस्पताल में सफाई तो दूर मरीजों के बेडों पर बिछाने वाली चादर तक दो-तीन दिनों तक नहीं बदली जा रही है। गंदी बेडशीटों पर ही मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। जबकि गलियों में भी फिनाइल का पोंछा व धुलाई नहीं की जा रही है। मिनी ऑपरेशन थियेटर में लगी स्ट्रेचर और टेबल के कपड़े तक सालों से नहीं बदले गए है।
जिला अस्पताल में भर्ती मरीज।
शुरू नहीं हुआ ट्रामा सेंटर
अस्पताल परिसर में ट्रामा सेंटर और मेटरनिटी वार्ड का काम भी अस्पताल प्रबंधन के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम साबित नहीं हो रहा है। लगातार तीन-चार सालों से इसका निर्माण ही पूरा नहीं हो रहा है। जबकि इसे लेकर कई बार निर्देश दिए जा चुके है। लेकिन हर बार 20 फीसदी तो कभी 10 फीसदी काम पूरा न होने की बात कहते हुए इसे शुरू करने से रोक दिया जाता है। जबकि अब तक इसे शुरू नहीं किया जा सका है, जिससे जिले के लोगों को मिलने वाली ट्रामा सेंटर और नए मेटरनिटी की सुविधाओं से मेहरूम होना पड़ रहा है और गंभीर मरीजों को इलाज के लिए राजस्थान जाना पड़ रहा है। इसके अलावा कई मरीजों को ट्रामा सेंटर न होने से रैफर किया जा रहा है।
मलेरिया के बढ़ने लगे मरीज
अस्पताल में अब वायरल फीवर के मरीजों के साथ मलेरिया के मरीजों की संख्या में भी इजाफा हो गया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा फोगिंग और दवा छिड़काव न कराने के कारण पनप रहे मच्छरों से बीमारी फैल रही है। जबकि मलेरिया विभाग का मरीजों को मच्छरदानी बांटने का काम भी अब तक शुरू नहीं हो सका है। नतीजा अस्पताल में रोज मलेरिया पीड़ित मरीज पहुंच रहे है। शहर में भी नपा की ओर से अब तक फोगिंग नहीं कराई गई है, कुछ वार्डों में फोगिंग कराने के साथ नपा ने भी अपनी इतिश्री कर ली है।