जिन अफसरों की विश्वसनीयता पर सवाल, सेंसटिव पोस्ट से हटाने होंगे
प्रदेश के सरकारी विभागों में संवेदनशील ओहदों पर काम कर रहे ऐसे अफसरों को हटाया जाएगा जिनकी इंटिग्रिटी पहले ही डाउटफुल मानी गई है यानी जो विशवसनीय नहीं हैं। हाईकोर्ट के आदेशों के बाद सरकार ने डाउटफुल इंटिग्रिटी वाले अफसरों को संवेदनशील पदों से हटाने के लिए प्रधान सचिव विजिलेंस प्रबोध सक्सेना ने सभी प्रशासनिक सचिवों को एक सर्कुलर जारी किया है। इस सर्कुलर में डाउटफुल इंटिग्रिटी वाले अफसरों को संवेदनशील पदों से हटाने के निर्देश दिए हैं।
उन्होंने सभी विभागों से हाईकोर्ट के आदेशों का सख्ती से पालन करने का आग्रह किया है। इस सर्कुलर में ये भी कहा गया है कि छह महीने के अंदर इस डिसिजन का रिव्यू करके पता लगाए कि डाउटफुल इंटिग्रिटी वाले कितने अफसर हटाए गए ताकि ये पता चले कि ऐसे कितने अफसर अभी हटाए नहीं गए हैं। जो विभाग डाउटफुल इंटीग्रिटी वाले अफसरों को संवेदनशील पदों से हटाने में गंभीरता नहीं दिखाएगा, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने 2013 में एेसे अफसरों को हटाने के अादेश दिए थे
हाईकोर्ट ने 18 जनवरी 2013 को पहली बार सरकार को संवेदनशील पदों पर बैठे डाउटफुल इंटीग्रिटी वाले अफसरों को हटाने के आदेश दिए थे। उसके बाद सरकार ने ऐसे कई अफसरों को हटा दिया, लेकिन प्रिंसिपल सेक्रेटरी विजिलेंस की ओर से सभी प्रशासनिक सचिवों के लिए जारी किए सर्कुलर में कहा गया है कि अभी भी प्रदेश में कई विभागों में संवेदनशील पदों पर डाउटफुल इंटीग्रिटी वाले अफसर तैनात हैं। जिन विभागों में ऐसे अफसर हैं, वे उन्हें न हटाकर कोर्ट के आदेशों की भी अवहेलना कर रहे हैं। दूसरी ओर इससे विभागीय कामकाज में भी पारदर्शिता नहीं आ पा रही है। विभागीय कामकाज में पारदर्शिता आए, इसके मद्देनजर ही डाउटफुल इंटीग्रिटी वाले अफसरों को हटाया जाना जरूरी है।
कई जगह से अफसर नहीं हटाए गए जो कोर्ट के अादेशों की अवहेलना है
ऐसे सामने आए, डाउटफुल इंटिग्रिटी वाले अफसरविभागों में डाउटफुल इंटिग्रिटी वाले अफसरों की पहचान के मापदंड तय हैं। मुख्य रूप से इस श्रेणी में उन अफसरों को रखा जाता है जिनके खिलाफ रिश्वत, गलत तरीके से नियुक्ति देने, बड़े प्रोजेक्ट में गोलमोल, सामान की खरीद में वित्तीय अनियमितता बरतने जैसे मामलों में अफसरों को डाउटफुल इंटीग्रिटी में रखा जाता है। हालांकि, ऐसे अफसरों के लिए पदोन्नति रुक जाती है, मगर ये अधिकारी विभागों में ही अहम पदों पर रहकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। पदोन्नति के लिए ऐसे अफसरों को विजिलेंस की क्लियरेंस जरूरी होती है।
अगर जरूरी तो सीएम की मंजूरी से अगर किसी विभाग में संवेदनशील पद पर तैनात डाउटफुल इंटीग्रिटी वाले अफसर का कोई विकल्प नहीं है तो विभाग को उस अधिकारी को उस पद पर तैनात रखने के लिए मुख्यमंत्री से मंजूरी लेना आवश्यक होगा। अगर मुख्यमंत्री से मंजूरी मिली तभी वह अफसर उस पद पर तैनात रहेगा। वरना सीएम की मंजूरी के बगैर विभाग जबरन डाउटफुल इंटीग्रिटी वाले अफसर को किसी विकल्प के न होने पर संवेदनशील पद पर नहीं रख सकता है। विभाग को उसे हर हाल में हटाना ही पड़ेगा।
काम में पारदर्शिता लाने के लिए एेसे अफसर हटाए जाना जरूरी
भ्रष्टाचार रोकने के लिए लिया था फैसला
ऐसे अधिकारियों को पहले भी भ्रष्टाचार न हो, इसके लिए ऐसे पदों पर तैनाती न देने के आदेश दिए थे, लेकिन राज्य सरकार अपने स्तर पर कभी इस तरह के फैसले नहीं ले सकी। इसके बाद जब हाईकोर्ट के आदेश आए तो ही राज्य भर में इसे लागू किया जा सका।