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25 मेगावाट तक के प्रोजेक्टों की फोरेस्टेशन के लिए नहीं खरीदनी पड़ेगी निजी भूमि

3 वर्ष पहले
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हिमाचल में छोटे प्रोजेक्ट लगाने वाले निवेशकों को केंद्र सरकार ने बड़ी राहत दी है। 25 मेगावाट क्षमता तक के प्रोजेक्ट लगाने वाली कंपनियों को अनिवार्य वनीकरण (कंपलसरी फोरस्टेशन) के लिए निजी भूमि नहीं खरीदनी पड़ेगी। राज्य में निवेशकों पर यह शर्त काफी महंगी पड़ती थी। राज्य में निजी भूमि के अलावा महज वन भूमि ही है। वन भूमि पर यह संभव नहीं हो सकता था। निवेशकों को प्रोजेक्ट लगाने के अलावा निजी भूमि पेड़ लगाने के लिए खरीदनी पड़ती थी। इस पर ही कंपनियों को 5 से 10 करोड़ की राशि खर्च करनी पड़ती थी। अब इसमें केंद्र सरकार ने राज्य की मांग को स्वीकार करते हुए डी ग्रेडिड यानी नदियों या खड्डों के किनारे की वेस्ट भूमि पर वनीकरण करने की छूट दी है। इसमें तर्क दिया है कि इस भूमि में पेड़ लगने से भूमि का कटाव रुकेगा आैर निवेशकों को भी बड़ी राहत मिलेगी। अतिरिक्त मुख्य सचिव वन एवं ऊर्जा तरुण कपूर ने माना कि केंद्र की आेर से इसकी राहत मिली है। इससे ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा। राज्य में 25 मेगावाट क्षमता से कम वाले प्रोजेक्टों की संख्या 50 के लगभग है। यह सीधे तौर पर केंद्र से मिली राहत से लाभांवित होंगे। राज्य में बिजली की जल विद्युत परियोजना लगाने के प्रति मेगावाट आैसतन खर्च 8 करोड़ आता है। इसमें केंद्र सरकार की आेर से मिली राहत से 50 लाख प्रति मेगावाट तक की कमी आ सकती है। इससे निवेशकों को लाभ मिलेगा।

राज्य का 66 फीसदी हिस्सा फोरेस्ट : राज्य में कुल क्षेत्रफल का 66 फीसदी वन भूमि का है। राज्य के कुल क्षेत्रफल 55 हजार 673 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 37 हजार वर्ग किलोमीटर वन भूमि के तहत आता है। इसके अलावा निजी भूमि है। शामलात भूमि भी गांव की मलकियत में है। सरकारी भूमि के नाम पर इसके अलावा ज्यादा भूमि नहीं है। इसलिए केंद्र की यह शर्त हिमाचल में सबसे ज्यादा प्रोजेक्ट संचालकों को खलती है। 25 मेगावाट क्षमता से ज्यादा के प्रोजेक्टों पर यह शर्त आगे भी लागू रहेगी।

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