योग कर्मसु कौशलम, अर्थात कर्म में कुशलता ही योग है। कर्म में कुशलता प्राप्त करने के लिए अभ्यास ही मार्ग है। हम यहां एक सी गणवेश पहनकर, एक जैसी दिनचर्या अपनाकर एकरूपता का अभ्यास करते हैं। यह बाह्य सौंदर्य है, स्थूल योग है। एकता में सौंदर्य है किन्तु यह योग नहीं है। हमारी एकता प्रभु से मिलन का प्राथमिक मार्ग है। शहर में चल रहे उच्च प्रशिक्षण शिविर के आठवें दिन संघ प्रमुख भगवानसिंह रोलसाहबसर प्रभात संदेश में शिविरार्थियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बाह्य कर्म करने के लिए स्थूल शरीर की आवश्यकता है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो कर्म में कुशलता नहीं आती। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार व चित्त का चतुष्टय जब तक एक लय में नहीं आ जाए, तब तक कर्म की कुशलता प्राप्त नहीं होती। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अठारहवें अध्याय में कर्म के पांच कारण बताए है, अधिष्ठान, कर्त्ता, करण, विविध प्रकार की चेष्टाएं और दैव। यह पांचों उपस्थित हो और सम्यक रूप से इनका सदुपयोग हो तो कर्म घटित होता है और उसमें कुशलता आती है। संघ में आकर निर्देशों का यथारूप पालन किया जाए तो भी हम कर्म कौशल रूपी योग की ओर अग्रसर होंगे। दिए हुए कार्य को बिना किन्तु परन्तु ईश्वरीय कार्य जानकर करते रहे तो कामनाएं व्यवधान नहीं बन सकेगी। संघ मार्ग पर जो चलता है, वह ईश्वर को प्राप्त होगा ही। इसलिए संघ की साधना को संपूर्ण योग मार्ग कहा गया है। शिविर में मेरी साधना पर चर्चा में बताया गया कि साधक के साधना के पथ पर प्रगति के पथ पर सबसे बड़ा दुश्मन मित्रवत प्रतीत होने वाला अहंकार है। आवश्यकता है अहंकार के छद्म रूपों को पहचानने की व उनसे सावधान रहने की। अहम् से बचने व उसे पोषित नहीं करने की बात कही गई। अर्थबोध में तनसिंह द्वारा रचित सहगीत अरमानों की दुनिया सदा जले पर चर्चा हुई। बौद्धिक प्रवचन के दौरान हमारे समाज की सांस्कृतिक मान्यताओं की जानकारी दी गई। भारतीय ग्राम्य आलोकायन आश्रम बाड़मेर में शिविर की दिनचर्या के अनुसार कार्यक्रम हुए। शिविर में प्रातः एवं सायंकालीन खेलों द्वारा शिविरार्थियों को संघर्षशीलता, ईमानदारी, सहयोग, अनुशासन आदि गुणों का अभ्यास करवाया गया।