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गीता हमारा धर्मशास्त्र, इसका कर्म सिद्धांत संघ का मूल मंत्र: रोलसाहबसर

3 वर्ष पहले
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संघ के शिविर में जो भी आदेश दिया जाता है जो कर्म करवाया जाता है, वही हमारा शास्त्र सम्मत कर्म है। क्योंकि संघ गीता के दर्शन का अनुसरण करता है। ऋषियों योगियों द्वारा अपने तपोबल से ईश्वर से अर्जित ज्ञान का संग्रह ही शास्त्र है। वही ज्ञान जो सूर्य से ऋषियों मुनियों से आते आते विलुप्त हो गया था। महाभारत के युद्ध मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के रूप में अर्जुन को कहा वही गीता हमारा धर्मशास्त्र है। गीता का कर्म सिद्धांत ही संघ का मूल मंत्र है। संघ प्रमुख भगवानसिंह रोलसाहबसर ने भारतीय ग्राम्य आलोकायन बाड़मेर में चल रहे उच्च प्रशिक्षण शिविर के छठे दिन शिविरार्थियों को अपने प्रभात-संदेश में यह बात कही।

वरिष्ठ स्वंयसेवक यशवर्धन सिंह झेरडी ने स्वयंसेवकों को सं‍बोधित करते हुए कहा कि क्षत्रिय का जीवन दूसरों के लिए है। प्राचीन काल में दूसरों के रक्षार्थ युद्ध मैदान में घोड़े चढ़ तलवार लेकर दुश्मन को हाथ दिखाते हुए वीर गति को पाकर अपने धर्म का पालन करते थे। अब समय बदल गया है तलवार व घोड़े से नहीं कानून के दायरे में विधि सम्मत दिए गए अधिकारों को कलम में माध्यम से प्राप्त कर अपने धर्म का पालन किया जा सकता है। अब लड़ने का तरीका व साधन दोनों बदल गए है। आरटीआई, जनहित याचिका, उपभोक्ता न्यायालय, सतर्कता समितियों, लोकायुक्त आदि के माध्यम से दूसरों के हितों का संरक्षण किया जा सकता है। बौद्धिक कार्यक्रम में बताया गया कि एक क्षत्रिय का जीवन दूसरों के लिए आदर्श व अनुकरणीय युगों से होता आया है इसके पीछे मुख्य कारण क्षत्रिय के जीवन में स्वतः प्रस्फुटित होने वाला अनुशासन है। अनुशासन के बल पर ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। संघ व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला है।

बाड़मेर. शिविर में स्वंयसेवकों को जानकारी देते यशवर्धनसिंह झेरडी।

भास्कर संवाददाता | बाड़मेर

संघ के शिविर में जो भी आदेश दिया जाता है जो कर्म करवाया जाता है, वही हमारा शास्त्र सम्मत कर्म है। क्योंकि संघ गीता के दर्शन का अनुसरण करता है। ऋषियों योगियों द्वारा अपने तपोबल से ईश्वर से अर्जित ज्ञान का संग्रह ही शास्त्र है। वही ज्ञान जो सूर्य से ऋषियों मुनियों से आते आते विलुप्त हो गया था। महाभारत के युद्ध मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के रूप में अर्जुन को कहा वही गीता हमारा धर्मशास्त्र है। गीता का कर्म सिद्धांत ही संघ का मूल मंत्र है। संघ प्रमुख भगवानसिंह रोलसाहबसर ने भारतीय ग्राम्य आलोकायन बाड़मेर में चल रहे उच्च प्रशिक्षण शिविर के छठे दिन शिविरार्थियों को अपने प्रभात-संदेश में यह बात कही।

वरिष्ठ स्वंयसेवक यशवर्धन सिंह झेरडी ने स्वयंसेवकों को सं‍बोधित करते हुए कहा कि क्षत्रिय का जीवन दूसरों के लिए है। प्राचीन काल में दूसरों के रक्षार्थ युद्ध मैदान में घोड़े चढ़ तलवार लेकर दुश्मन को हाथ दिखाते हुए वीर गति को पाकर अपने धर्म का पालन करते थे। अब समय बदल गया है तलवार व घोड़े से नहीं कानून के दायरे में विधि सम्मत दिए गए अधिकारों को कलम में माध्यम से प्राप्त कर अपने धर्म का पालन किया जा सकता है। अब लड़ने का तरीका व साधन दोनों बदल गए है। आरटीआई, जनहित याचिका, उपभोक्ता न्यायालय, सतर्कता समितियों, लोकायुक्त आदि के माध्यम से दूसरों के हितों का संरक्षण किया जा सकता है। बौद्धिक कार्यक्रम में बताया गया कि एक क्षत्रिय का जीवन दूसरों के लिए आदर्श व अनुकरणीय युगों से होता आया है इसके पीछे मुख्य कारण क्षत्रिय के जीवन में स्वतः प्रस्फुटित होने वाला अनुशासन है। अनुशासन के बल पर ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। संघ व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला है।

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