दीक्षा लेना तलवार की धार के समान है: सागर
दिगंबर त्व का धारण करना जैन दर्शन में मुनि व्रत कहलाता है। और इन व्रतों को पालन करने वाले मुनिराज निरंतर साधना में रत होकर 28 मूल गुणों का पालन करते है। गर्मी,सर्दी,बरसात हर मौसम में उन्हें अपने नियमों का पालन करना है और इस कठोर साधना को करके अपने पाप कर्मों का क्षय करना है। इसलिए जैनत्व की दीक्षा का धारण करना तलवार की धार पर चलने के जैसा होता है। वहीं जीवन को सफल बनाने के लिए हमेें सदैव अपनी वाणी पर सयंम रखना चाहिए। ऐसा करने से मन शांत रहता है। यह नसीहत जैनाचार्य सुंदर सागर महाराज ने बुधवार को चंद्र प्रभ जिनालय पर धर्मसभा को संबोधित कर कही।
उन्होंने कहा कि संत एक वक्त में भोजन करते उसी वक्त में पानी,और हो जाए अंतराय तो भैया न भोजन न पानी। अर्थात मुनि पूरे 24 घंटे में एक ही बार आहार चर्या को निकलते है,और विधिपूर्वक नवा भक्ति के पगहा के साथ आहार ग्रहण करते है। न गर्मी पंखा कूलर और न सर्दी में ओढऩे रजाई सबका त्याग आजीवन और जहां भी जाना है वहां पैदल ही जाना है किसी वाहन का सहारा नहीं। इसलिए संत वहीं जो दिगंबर मुद्रा का धारी हो और उसके पास पिच्छी कमंडल के अलावा और कुछ न हो। इस तरह की पूरी चर्या के साथ 28 मूल गुणों का पालन करना वह भी सावधानी से।
धर्म
मुनि सुयश सागर और मुनि सुकर्म सागर सहित 5 क्षुल्लिका का मना दीक्षा उत्सव
2 मुनि और 5 क्षुल्लिका माताजी का मना दीक्षा उत्सव
मुनि सुयश सागर और मुनि सुकर्म सागर सहित 5 क्षुल्लिका माताजी के दीक्षा दिवस के अवसर पर मुनि महाराज का पादप्रक्षालन पूरन चंद रिंकू कुमार और पुरुषोत्तम पारस परिवार के साथ विजय कुमार राजेश वोटा ने किया। जबकि शास्त्र भेंट करने का अवसर चिंतामणि किलावनी,सूरज जैन,सिंघई अजित जैन धौलागढ,मुकेश मगरोनी और सुरेश फतेहपुर के साथ राजकुमार एलआईसी ने किया।