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11 साल बाद फैसला नवलगढ़ रोड की जमीन परिषद की, पार्क बनेगा

3 वर्ष पहले
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सदरथाना के पास स्थित नगर परिषद की जमीन को लेकर परिषद ने 11 साल कोर्ट केस लड़ा। मामले में सिविल न्यायाधीश (कनिष्ठ खंड) ने 31 मार्च को परिषद के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बस यूनियन द्वारा की गई स्थायी निषेधाज्ञा की मांग को अस्वीकार कर वाद खारिज कर दिया। अब परिषद इस जमीन पर पार्क व सुविधाघर का निर्माण करेगी। मामले के अनुसार नवलगढ़ रोड स्थित सदरथाना के पास खाली सरकारी जमीन पर निजी मोटर ऑपरेटर बस स्टैंड संचालित कर रहे हैं। यहां से सीकर-मंडावा, गुढा, पालड़ी, तारपुरा आदि रूटों पर चलने वाली बसों का ठहराव होता है। ऑपरेटरों का दावा है कि 1994 में तत्कालीन जिला कलेक्टर व यूनियन पदाधिकारियों की वार्ता के बाद यहां बस स्टैंड का स्थान तय किया गया था। लेकिन जमीन नगर परिषद की होने के कारण परिषद ने 2006 में यहां पार्क व सुविधाघर निर्माण की प्रक्रिया शुरू की। जमीन खाली कराने के दौरान विवाद होने पर बस यूनियन प्रतिनिधि मामले को कोर्ट में ले गए। कोर्ट ने जमीन पर निर्माण के मामले में स्टे जारी कर दिया। इसके बाद बस यूनियन ने कोर्ट में जमीन को स्थाई तौर पर बस स्टैंड के लिए आवंटित किए जाने की मांग को लेकर स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की। मामले में सुनवाई करते हुए 31 मार्च 2018 को सिविल न्यायाधीश (कनिष्ठ खंड) सीमा हुड्डा ने आदेश दिया कि जमीन की वास्तविक मालिक नगर परिषद है। ऐसे में जमीन मालिक के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा जारी नहीं की जा सकती है। ऐसे में बस ऑपरेटरों के वाद खारिज किया जाता है। नगर परिषद की ओर से एडवोकेट अरुण शर्मा ने पैरवी की।

2006 में नगर परिषद द्वारा काम शुरू करने पर हुआ था विवाद, ऑपरेटर गए थे कोर्ट में, अब आया फैसला

ऑपरेटर साबित नहीं कर पाए कि उन्हें जगह नगर परिषद ने दी

सुनवाई में मोटर ऑपरेटर यह साबित करने में असफल रहे कि यूनियन को बसें खड़ी करने के लिए जगह नगर परिषद द्वारा बताई गई थी। नगर परिषद प्रशासन यह साबित करने में सफल रहा कि विवादित जमीन का मालिकाना हक परिषद का है। नगर परिषद की इस जमीन पर आईडीएसएमटी स्कीम के तहत पार्क विकसित करने की योजना है। इसे रुकवाने का बस यूनियन के पास कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि जमीन नगर परिषद की है।

कब्जा लेने में देरी पर अटक सकता है मामला | कोर्ट फैसले के बाद कब्जा लेने में देरी करने से मामला फिर अटक सकता है। नियमानुसार फैसला आने के बाद परिषद प्रशासन को उस जमीन पर कब्जा लेना था, ताकि बस ऑपरेटरों को वहां से बस संचालित करने से रोका जा सके। इसके अलावा प्रस्तावित पार्क व सुविधाघर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जानी थी, लेकिन परिषद इसमें लापरवाही बरत रहा है। इससे दूसरे पक्ष को मौका मिल सकता है।

सुनवाई में मोटर ऑपरेटर यह साबित करने में असफल रहे कि यूनियन को बसें खड़ी करने के लिए जगह नगर परिषद द्वारा बताई गई थी। नगर परिषद प्रशासन यह साबित करने में सफल रहा कि विवादित जमीन का मालिकाना हक परिषद का है। नगर परिषद की इस जमीन पर आईडीएसएमटी स्कीम के तहत पार्क विकसित करने की योजना है। इसे रुकवाने का बस यूनियन के पास कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि जमीन नगर परिषद की है।

कब्जा लेने में देरी पर अटक सकता है मामला | कोर्ट फैसले के बाद कब्जा लेने में देरी करने से मामला फिर अटक सकता है। नियमानुसार फैसला आने के बाद परिषद प्रशासन को उस जमीन पर कब्जा लेना था, ताकि बस ऑपरेटरों को वहां से बस संचालित करने से रोका जा सके। इसके अलावा प्रस्तावित पार्क व सुविधाघर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जानी थी, लेकिन परिषद इसमें लापरवाही बरत रहा है। इससे दूसरे पक्ष को मौका मिल सकता है।

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