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वर्तमान में लोग दान देकर बड़े-बड़े पोस्टर लगाते हैं, ऐसा दान सार्थक नहीं है : मुनि विश्रांत

3 वर्ष पहले
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दंग की नसिया में आयोजित धर्मसभा में मुनि विश्रांत सागर ने कहा कि धर्म प्रदर्शन के लिए नहीं, आत्म दर्शन के लिए होना चाहिए। आत्मा का कल्याण करने के लिए धर्म के मार्ग पर ही चलना ही होगा। वर्तमान में लोग दान देकर बड़े-बड़े पोस्टर लगाते हैं, वह दान सार्थक नहीं है। धर्म करने से पहले आत्म शुद्धि भी होनी चाहिए। बाहरी शुद्धि की क्रिया में अच्छा बनने का प्रयास करते हैं, अपने अंतरंग को पवित्र बना लो, आपका जीवन निर्मल हो जाएगा। माता-पिता के पर्यायवाची शब्दों की शाब्दिक परिभाषा समझाते हुए उन्होंने कहा कि भगवान महावीर स्वामी, श्रीराम व श्रीकृष्ण अपने पिताजी को तात कहते थे। रविसेन आचार्य स्वामी ने पदम पुराण में तात शब्द का प्रयोग कियाै। आज के समय में पिता को पापा कहा जाता है, जिसका अभिप्राय पाप का पा और स्वयं का प मैं भी पाप करूं आप भी पाप करो अर्थ प्रतीत होता है। मांगलिक क्रिया भागचंद सेठी सांवलोदा वाले द्वारा की गई। मंगलाचरण ब्रह्मचारी अमित भैया प्रदीप भैया ने की।

अध्यात्म से मानव के चित्त को शांति मिलती है : संत | चातुर्मास सत्संग समिति की अोर से आयोजित चातुर्मास में संत डूंगरदास ने कहा कि भौतिक संसाधन इस संसार की माया है, जिसमें मानव घूमता रहता है। अध्यात्म के संसार में मानव के चित्त को शांति मिलती है।

दंग की नसिया में आयोजित धर्मसभा में हुए कई कार्यक्रम

सीकर. मुनि विश्राम सागर की आरती करते जैन समाज के लोग।

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