भगवान के प्रति इंसान के मन में श्रद्धा, भक्ति व समर्पण का भाव होना चाहिए। यदि इंसान के मन मे भगवान के प्रति श्रद्धा, भक्ति व समर्पण नहीं है तो एेसा व्यक्ति आस्तिक नहीं हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि मानव भगवान के प्रति समर्पित रहे। वर्तमान में मानव स्वयं के द्वारा किए जा रहे गलत आचरण के कारण दुखी है।
यह उद्गार पंडित त्यागी विश्वेश प्रपन्नाचार्य महाराज अयोध्या ने व्यक्त किए। वह सोजनीधाम में आयोजित श्रीराम कथा कार्यक्रम में रविवार को उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस मानव के पास भगवान की आराधना, स्तुति करने के लिए समय नहीं है, उस मानव का जीवन न-केवल व्यर्थ है, बल्कि वर्तमान जीवन भी पशुवत है। यदि मानव के रूप में भारत की बसुंधरा पर जन्म लिया है तो इंसान को भगवान की स्तुति करनी चाहिए। धर्म के मार्ग का अनुशरण करना चाहिए ताकि जीवन में समरसता का भाव आ सके। इसके साथ ही जीवन में कभी भी संकटों का सामना करना न पड़े। त्यागी विश्वेश प्रपन्नाचार्य महाराज ने बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की सुंदरता के समान जगत में कोई दूसरा रूप नही हैं, एक मात्र श्रीराम ही हैं। आपने कहा कि संत की पहचान करना वर्तमान समय में बड़ा ही कठिन कार्य है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले संत की कैसे पहचान की जाए, यह सोचने वाली बात है। उन्होंने इंसान को भगवान से संबंध जोड़े जाने के लिए प्रेरित करते हुए श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान से संबंध जोड़ोगे तो जीवन में सदा सुखी रहोगे। यदि भगवान से संबंध जोड़ने का प्रयास नहीं किया अथवा भगवान का अस्तित्व ही नहीं माना तो एेसा व्यक्ति जीवन में कभी भी सुख को प्राप्त नहीं कर सकता है। जीवन में सुख पाना है तो भगवान के अस्तित्व को मानने के साथ ही धर्म रूपी आचरण को जीवन में आत्मसात करना होगा, तभी जीवन में सफलता प्राप्त हो सकती है। कथा प्रारंभ होने के पूर्व श्रद्धालुओं द्वारा व्यास गादी की पूजा-अर्चना की गई।