अहंकार ही मानव के विनाश का कारण होता है। मानव के मन में अहंकार रूपी रावण ने अपना स्थान बना लिया है। इसके बाद भी वह अहंकार का त्याग नहीं कर पा रहा। यह उद्गार पंडित त्यागी विश्वेश प्रपन्नाचार्य महाराज व्यक्त किए। वह सोजनीधाम में आयोजित श्रीराम कथा कार्यक्रम में शनिवार को उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे।
अयोध्या से सोजनीधाम आए त्यागी विश्वेश प्रपन्नाचार्य महाराज ने बताया कि प्रत्येक प्रत्येक हिंदु व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह एकादशी का व्रत रहे। यह व्रत भगवान विष्णु के लिए रखा जाता है। एकादशी का व्रत रखे जाने से भगवान विष्णु भक्त से प्रसन्न होते हैं। बल्कि व्रत रखे जाने से संयम की भावना का विकास भी होता है। माता
पिता तथा गुरुजनों की सेवा किए जाने को सर्वोपरि बताते हुए उन्होंने कहा कि माता पिता तथा गुरुजनों की सेवा सभी को करनी चाहिए। सेवा करने से मातापिता व गुरुजनों का आशीर्वाद सेवा करने वाले को प्राप्त होता है। प्राप्त हुए आशीर्वाद से कठिन से कठिन कार्य भी सफलता के साथ पूर्ण हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में मानव स्वार्थी हो गया है। स्वार्थ के लिए ही वह धर्म स्थलों पर जाकर भगवान की स्तुति करता है। तथा दर्शन करने के साथ ही वह कहता है कि भगवान मेरा फलां कार्य हो जाए तो में मंदिर में यह दान करुंगा। मानव की एेसी सोच ही उसके स्वार्थी होने का प्रमाण होती है। जबकि विश्वास के बगैर भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। भगवान को प्राप्त करना है तो दयावान, श्रद्धावान होना पड़ेगा व विश्वास के साथ की जाने वाली स्तुति से ही भगवान व्यक्ति के ह्रदय मे भगवान विराजमान होते हैं। भक्ति ही विश्वास की आधारशिला होती है।