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धियो यो न: प्रचोदयात की व्याख्या की गहलोत ने

3 वर्ष पहले
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आर्य समाज कोर्ट रोड सिरसा में साप्ताहिक हवन यज्ञ व वैदिक सत्संग का आयोजन किया गया। यज्ञ के ब्रह्मा राजकुमार आर्य थे। यजमान का पद निहारिका आर्य ने ग्रहण किया जबकि सभाध्यक्ष का पद विजय कुमार सैनी ने ग्रहण किया। यज्ञ के बाद ईश प्रार्थना के बारे में प्रबंधक राजकुमार वर्मा ने विस्तार से चर्चा की।

ओमप्रकाश, कुलदीप आर्य, वेदप्रकाश सरदारा, निहारिका आर्य ने भजन प्रस्तुत किए। आर्य समाज के वरिष्ठ उपप्रधान भूपसिंह गहलोत ने धियो यो न प्रचोदयात की व्याख्या करते हुए बताया कि भक्ति के तीन अंग होते हैं। स्तुति, उपासना और प्रार्थना। स्तुति से प्रेम और श्रद्धा उत्पन्न होती है। उपासना से दृढ़ता व ईश्वर के गुणों की प्राप्ति होती है। प्रार्थना से सहायता की प्राप्ति होती है। भक्ति के इन तीनों अंगों का सही उचित क्रम है कि सबसे पहले स्तुति, फिर उपासना और फिर प्रार्थना करनी चाहिए। गायत्री मंत्र में भी यही क्रम है। स्तुति, उपासना और फिर अंतिम पाद में प्रार्थना की गई है। इस अंतिम पाद में चार पद हैं। धियो यो न प्रचोदयात। यह-वह परमात्मा। न-हमारी सबकी, धिय-हमारी बुद्धियों को, प्रचोदयात-प्रेरित करें, अर्थात बुरे कर्मों से छुड़ाकर श्रेष्ठ कार्यों में प्रेरित करें। प्रार्थना के बारे में वेदों में भी बताया है कि प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है। सच्चे हृदय से की हुई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती। इस प्रकार गायत्री मंत्र के द्वारा अनेक प्रकार की मानसिक शक्तियां, सहज रूप में हमारे जीवन में प्रवेश करती जाती हैं जोकि मन को शांत करती हैं और शांत मन ही चित्त को शांति और स्थिरता देता है। वयोवृद्ध आर्य समाजी जय दयाल पूर्व सेवानिवृत्त अध्यापक ने बाबा साहब अंबेडकर की जयंती पर विस्तार से चर्चा की।

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