अधिकतर स्कूल वाहनों में बच्चों की जिंदगी सुरक्षित नहीं है। जिले में बड़ी संख्या में ड्राइवर प्रशिक्षित नहीं हैं। बड़ी संख्या में इनके पास लाइसेंस भी नहीं है। कुछ के पास है भी तो वह दूसरे प्रदेशों से बनवाकर कैब, ऑटो रिक्शा, बस दौड़ा रहे हैं। प्रशासन ने संदेह जताया है कि उनके लाइसेंस की असली होने की कोई गारंटी नहीं है, जबकि परिवहन विभाग की तरफ से जारी किए गए लाइसेंस को ही मान्यता है। बावजूद इसके स्कूल संचालक सस्ते के लालच में अनट्रेंड ड्राइवरों को रखते हैं। इसके अलावा 30 प्रतिशत से अधिक स्कूलों की बसों में आज तक सीसीटीवी, लेडी अटेंडेंट सहित तमाम निर्देशों की पालना नहीं की जा रही है, जिससे जिले के 50 हजार से अधिक बच्चों को अभिभावक हर दिन इन माध्यमों से स्कूल भेजने को विवश हैं।
सूत्र बताते हैं कि जिन स्कूली वाहनों में कैमरे लगाए गए हैं, उनकी रिकॉर्डिंग ही नहीं है। ऐसे में उन्हें लगाने का फायदा नहीं है। इस कारण ड्राइवर और हेल्पर बस में अलर्ट नहीं रहते। कैमरे लगाए जाने का मकसद था कि बसों में बरती जा रही लापरवाही को परखा जाए। जिले में 800 स्कूली वाहन हैं। दूसरे राज्य में हैवी लाइसेंस बनवाने के लिए एक महीने की ट्रेनिंग नहीं लेनी पड़ती। घर बैठे ही दो से तीन हजार रुपए में लाइसेंस दलाल के माध्यम से उपलब्ध हो जाता है। जबकि रोडवेज की तरफ से बनाए जा रहे हैवी लाइसेंस में एक महीने की ट्रेनिंग जरूरी है। इस ट्रेनिंग में नंबर आने की एक साल की वेटिंग लिस्ट चल रही है।
इन नियमों की पालना करना आवश्यक है : मोटर व्हीकल एक्ट के मुताबिक ड्राइविंग के दौरान चालक मोबाइल को स्विच ऑफ रखेगा या हेल्पर को मोबाइल देगा। गाड़ी को टेंशन मुक्त होकर चलाएं। हेल्पर बच्चे को उतारकर माता-पिता को सौंपे। अभिभावक न हो तो बच्चों को सड़क क्रॉस करवाएं। सड़क क्रॉस भी वाहन के पीछे की तरफ से जाएंगे।