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11 साल बाद सर्वार्थ सिद्धि महासंयोग; आज आभूषण, वाहन व प्रोपर्टी की खरीद होगी फलदायी
श्रीगंगानगर| बैशाख शुक्ल तृतीया यानी अक्षय तृतीया इस बार बुधवार को मनाई जाएगी। लगभग 11 साल बाद अक्षय तृतीया पर 23 घंटे का सर्वार्थ सिद्धि योग का महासंयोग बन रहा है। इस दिन मांगलिक कार्य का विशेष लाभ मिलेगा। वहीं, अबूझ मुहूर्त में विवाह-शादियां भी होंगी। हिन्दू पंचांग के बैशाख माह की शुक्ल पक्ष तृतीया को परशुराम जयंती मनाई जाती है, इसलिए अक्षय तृतीया व परशुराम जयंती को लेकर शहर में कई स्थानों पर समारोह भी होंगे। ज्योतिषाचार्य जगदीश सोनी ने बताया कि अक्षय तृतीया 18 को सुबह 4.18 बजे से शुरू होकर 19 अप्रैल की सुबह 3.04 बजे तक रहेगी। अक्षय तृतीया पर लगभग 23 घंटे का सर्वार्थसिद्धि योग का महासंयोग बन रहा है। इसमें दिनभर खरीदारी या कोई भी शुभकार्य किए जा सकते हैं।
ये हैं श्रेष्ठ मुहूर्त...आज सुबह 8:15 से लेकर रात तक महासंयोग में कर सकेंगे खरीदारी
विद्वानों के अनुसार अक्षय तृतीया का पूरा दिन ही शुभ कार्यों व खरीदारी के लिए श्रेष्ठ रहेगा। इस दिन सोने के आभूषण खरीदने का विशेष महत्व होता है। फिर भी इन मुहूर्तों में वस्तु विशेष की खरीदारी व शुभ कार्य करने से अक्षय फल मिलेगा। जमीन, मकान, दुकान के लिए सुबह 8:15 से रात तक, आभूषण, वाहन, वस्त्र के लिए सुबह 10:51 से रात तक, सजावट, फर्नीचर के सुबह 11:15 से शाम 6:48 तक और इलेक्ट्रिक सामान, मशीनरी के लिए दोपहर 3:40 से शुभ मुहूर्त है।
मई-जून में विवाह के सबसे ज्यादा मुहूर्त
अक्षय तृतीया के दिन से ही विवाह व अन्य शुभ काम शुरू हो जाएंगे। एक माह से चल रहा मलमास 14 अप्रैल से खत्म हो चुका है। इसके बाद 18 से विवाह शुरू हो रहे हैं, जो 11 जुलाई तक चलेंगे। इसके बाद मई और जून में सबसे ज्यादा विवाह के मूहूर्त होंगे। 11 जुलाई को विवाह का आखिरी मुहूर्त है। इसके बाद 23 जुलाई को देवशयनी एकादशी को देव सो जाएंगे और 19 नवंबर तक देवशयन काल रहेगा। देवउठनी एकादशी के साथ विवाह के मुहूर्त शुरू हो जाते हैं, लेकिन 17 से 31 अक्टूबर तक शुक्र का तारा अस्त रहेगा।
संयोग ये भी...आज मनाई जाएगी परशुराम जयंती
अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम के अवतरण की तिथि भी है। वहीं द्वापर में इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को अज्ञातवास के दौरान अक्षयपात्र प्रदान किया था। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन त्रेतायुग का आरंभ हुआ था। यह तिथि सदैव स्थायी रहती है। पंचांग में इसका कभी क्षय नहीं होता है। इस वजह से इसे ईश्वर की तिथि माना गया है।