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शिकायत की सजा; दो साल से पड़े थे 2600 खाद्य सुरक्षा फार्म, सीएम तक पहुंचा मामला तो परिषद ने जांच के नाम पर 1641 किए निरस्त
भास्कर संवाददाता, श्रीगंगानगर।
राशन कार्ड पर खाद्य सुरक्षा की मुहर लगाने को लेकर नगर परिषद की नाकामी का एक और नमूना सामने आया है। आज से करीब सवा साल पहले नगरपरिषद ने बोर्ड की बैठक में 2600 राशन कार्डों को खाद्य सुरक्षा में पात्र माना था। अब उनमें से 1641 को अपात्र करार दे दिया है। प्रकरण में सभापति अजय चांडक से पूछा तो उन्होंने परिषद कर्मियों की गलती बता डाली। जबकि हकीकत ये है कि जिस बोर्ड बैठक में 2600 परिवारों को पात्र बताया गया था, वह सभापति चांडक की अध्यक्षता में हुई थी। बैठक से करीब 8 माह पहले इन लोगों ने आवेदन किए थे। दो साल तक ये 1641 परिवार परिषद व रसद विभाग के चक्कर काटते रहे। इस उम्मीद के साथ कि उनके कार्डों पर मुहर लगनी तो तय हो चुकी है, लेकिन परिषद ने नियमों में उलझा उन्हें रिजेक्ट ही कर दिया है। देखने लायक बात ये है कि परिषद ने खुद की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा कर लिया है। पहले जिन कार्डों को पात्र माना, अब खुद ही उन्हें अपात्र कह रही है। इसके अलावा दो साल तक राशन कार्ड लिए परिवारों को चक्कर कटवाना कहां तक न्यायसंगत है? बता दें बीती 28 मार्च को सीएम जनसंवाद में यह मुद्दा उठा था। इसके बाद सीएम वसुंधरा राजे ने भटक रहे परिवारों को राहत देने की बात कही थी।
परेशान लोगों ने श्रीगंगानगर दौरे में सीएम को की थी परिषद की शिकायत
शहर के वार्ड 20 निवासी सत्यपाल ने 18 मई 2017 को राशन कार्ड पर खाद्य सुरक्षा की मुहर लगाने के लिए आवेदन किया। बदहाल पारिवारिक स्थिति का भी हवाला दिया, लेकिन राशन कार्ड पर मुहर आज तक नहीं लगी। परिषद ने अब उसका आवेदन ही रद्द कर दिया है।
वार्ड 44 के मोहनलाल ने भी 27 जून 2016 काे नए राशन कार्ड पर खाद्य सुरक्षा की मुहर लगवाने के लिए आवेदन किया। लिखा कि उसने पुराना कार्ड भी जमा करवा दिया। इसके बाद कई बार डीएसओ व परिषद के चक्कर काटे, लेकिन लाभ नहीं मिला।
केस-1
दो बार बदले नियम...पहले तैयार होती थी रिपोर्ट, बाद में श्रमिक कार्ड देख देने लगे फायदा
पहले: कार्ड के लिए परिषद में आवेदन आने के तुरंत बाद सफाई इंस्पेक्टर की ओर से रिपोर्ट बनाई जाती थी। इसके बाद वे रिपोर्ट एचओ को सौंप देते थे। एचओ इस पर अपने हस्ताक्षर कर आयुक्त के समक्ष पेश कर देता था। यहां से डीएसओ को यह रिपोर्ट भिजवा दी जाती थी। इसके बाद मुहर लगा दी जाती थी, जिसे डीलर को देने पर योजना का लाभ मिलने लगता था।
अब: मजदूरी कार्ड, पेंशनधारी पीपीओ, श्रम विभाग का कार्ड, स्ट्रीट वेंडर, रिक्शा चालक, एकल महिला को योजना का लाभ दिया जा रहा है। यह नियम 1 नवंबर 2017 को लागू हुआ। इसी के आधार पर राशन कार्ड पर मुहर लगाई जाने लगी है। नवंबर से अभी तक 533 जनों को योजना का लाभ भी दिया जा चुका है।
पहले सभापति ने नप बैठक में बताया था पात्र, अब बोले- गलती कर्मचारियों की
सभापति अजय चांडक ने बताया कि आज कर्मचारी नियमों की बात कह फार्म निरस्त कर रहे हैं। नए नियमों से पहले भी जांच कर निस्तारण करवाया जा सकता था। सही यह है कि कर्मचारियों की गलती का ही नतीजा जनता को भुगतना पड़ रहा है।
आगे क्या.... मंत्रियों के दफ्तर व घर के सामने देंगे धरना
नगरपरिषद की आेर से खाद्य सुरक्षा योजना के फार्म निरस्त कर देने से नाराज उपसभापति अजय दावड़ा व पार्षद संजय बिश्नोई का कहना है कि जनसंवाद में शिकायत के बाद सीएम ने निस्तारण के आदेश दिए थे। इसके बाद भी नियमों का हवाला देकर फार्म निरस्त किए जा रहे हैं। हजारों रुपए वेतन लेने वाले कर्मचारियों को गरीबों की पीड़ा समझ नहीं आती। इस संबंध में मुख्यमंत्री से मिलेंगे वहीं मंत्री श्रीचंद कृपलानी व खाद्य आपूर्ति मंत्री के घर व दफ्तर के आगे धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। सरकार से दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे। पहले भी पार्षदों ने मंत्री के घर के आगे धरना लगाया था।
केस-2
आयुक्त ने कहा- दस्तावेज अधूरे थे, लोग आए नहीं, इसलिए कर दिए निरस्त
आयुक्त सुनीता चौधरी ने बताया कि हमने दो बार अखबारों के माध्यम से आवेदकों को दस्तावेज जमा करवाने के लिए निवेदन किया। कार्यालय से बाकायदा फोन भी कराए गए, लेकिन कोई आया नहीं। दस्तावेज पूरे नहीं होने के कारण ही फार्म निरस्त किए जा रहे हैं।
गड़बड़ी का शक
नप कर्मियों ने खुद को बचाने के लिए 10 दिन में ही कैसे जांच ली 2600 परिवारों की स्थिति?
27 जनवरी 2017 को सभापति अजय चांडक की अध्यक्षता में नगरपरिषद बोर्ड की बैठक हुई। इसमें सर्वसम्मति से 2600 से ज्यादा आवेदनों को स्वीकृति देकर इन्हें डीएसओ कार्यालय भिजवा दिया गया। दोनों विभागों की ढिलाई देखिए, सवा साल में भी अावेदन-पत्रों की ना जांच हुई और ना ही ऑनलाइन चढ़ाए गए। यहां तक कि आवेदकों को कमी तक नहीं बताई गई। वसुंधरा राजे 28 मार्च 2018 को यहां जनसंवाद करने पहुंची तो यह मुद्दा उठा और सीएम ने जिम्मेदार अफसरों को काम पूरा करने के लिए चेताया। इसके बाद हरकत में आए नगरपरिषद प्रशासन ने मात्र 10 दिन में ही सभी लंबित आवेदन-पत्रों की जांच पूरी कर ली और पहले चरण में 1641 आवेदन रद्द कर दिए। कहीं न कहीं ये जल्दबाजी में नौकरी बचाने जैसा प्रतीत होता है। शेष रहे अावेदन भी रद्द करने की बात कही जा रही है। अगर समय रहते आराम से तह तक जांच की होती तो आज अनेक गरीब लोग सरकार की योजना का लाभ ले रहे होते।
सवाल:परिषद ने ही इन्हीं के साथ आए 440 आवेदकों को सवा साल पहले ही पात्र बना दिया। इनमें ज्यादातर लोग अफसरों, कर्मचारियों व पार्षदों के परिचित बताए जा रहे हैं। सवाल यह है कि जिन्हें लाभान्वित किया गया, उनकी पात्रता के लिए नवंबर 17 से पहले का नियम लागू किया गया।