‘भाग मिल्खा भाग’ और ‘हवा हवाई’ के कलाकार
कुछ दिन पहले छोटे परदे पर अल्प बजट की सिताराविहीन फिल्म ‘हवा हवाई’ देखी। एक सात-आठ वर्ष के बालक को उसके साथी ने सूचना दी कि उसका पिता यक-ब-यक अचेत हो गया है। बालक अपनी पूरी क्षमता से दौड़ते हुए घर पहुंचता है जहां उसका पिता दम तोड़ चुका है। फिल्म प्रारंभ होती है स्कूल में एक स्केटिंग प्रतियोगिता से। स्केटिंग करते हुए बालक को अपना वह दौड़ना याद आता है जब उसे अपने पिता के अचेत हो जाने का समाचार मिला था और वह पैरों में पंख लगाकर दौड़ा था। स्केटिंग के दौरान बालक की स्मृति में वह दौड़ बार-बार कौंध रही है और उस समय उसकी भोगी हुई पीड़ा इस समय उसे ऊर्जा दे रही है। स्मृति पुराने जमाने के वाष्प से चलने वाले रेलवे इंजिन की धधकती भट्टी की तरह होती है। बिमलरॉय निर्देशित ‘देवदास’ में रेल के डिब्बे में बैठे देवदास को वहां पुराने मित्र चुन्नीबाबू मिल जाते हैं। चुन्नीबाबू अपने गन्तव्य स्टेशन पर गाड़ी से उतर जाते हैं परन्तु अपनी शराब की बोतल वहीं छोड़ जाते हैं। बिमल रॉय ने देवदास के शराब पीते ही, इंजिन की भट्टी में कोयला डाले जाने वाले शॉट को इन्टरकट में दिखाया है। फिल्म माध्यम के वैष्णव कवि बिमल रॉय की ‘देवदास’ अन्य ग्यारह संस्करणों से बेहतर है। राजिंदर सिंह बेदी के लिखे हुए संवादों में बार-बार दोहराया जाता है कि ‘कौन कमबख्त कहता है कि मैं पीता हूं, पीता हूं कि सांस चलती रहे’। बेदी के शब्द और दिलीप कुमार की अदायगी ने कहर ढा दिया था।
‘भाग मिल्खा भाग’ में भी विभाजन के समय दंगाइयों से घिरा हुआ पिता अपने आठ वर्ष के पुत्र से कहता है ‘भाग मिल्खा भाग’ और यही बात उसकी स्मृति में कौंधती है जब वह एशियन खेलकूद प्रतियोगिता में दौड़ रहा है। स्मृति में ऊर्जा का जन्म होता है। भव्य बजट की ‘भाग मिल्खा भाग’ और अल्प बजट की ‘हवा हवाई’ में बचपन में घटी घटनाओं के ऊर्जा बन जाने के दृश्य हैं। चंद्रकांत देवताले ने इस आशय की बात लिखी थी कि स्मृति का हिरण अनजान झाड़ियों के बीच छलांग लगाता हुआ अदृश्य हो जाता है। हमारे धार्मिक आख्यानों में ही हिरण के रूपक का प्रयोग हुआ है। सीता के आग्रह पर श्रीराम एक स्वर्ण मृग का पीछा करने गए थे। दुष्यंत भी हिरण के आखेट पर गए थे, जहां उन्हें शकुंतला से प्रेम हो गया था। यह संभव है कि हिरण के रूप के प्रयोग का एक कारण यह भी हो कि कस्तूरी मृग अपनी नाभि से आ रही गंध की खोज में बाहर भटकता रहता है जैसे मनुष्य अपनी विचार प्रक्रिया में निवास करते ईश्वर की खोज में जाने कहां-कहां भटकता रहता है। युद्ध फिल्मों के लिए प्रसिद्ध एक फिल्मकार बार-बार यह कहते थे कि जो भी उनसे सहमत नहीं या उनका विरोधी है, ईश्वर उसे नष्ट कर देते हैं। इस फिल्मकार ने अपने टुच्चेपन से अपने ईश्वर को ही बौना कर दिया है।
‘भाग मिल्खा भाग’ हो या ‘हवा हवाई’, अधिकांश फिल्में आम आदमी की इच्छा शक्ति और सतह से ऊपर उठने के प्रयास का ही यशोगान करते हैं। आख्यानों में सूर्यवंशी, चंद्रवंशी इत्यादि नायक हैं परन्तु सिनेमा में आम आदमी नायक है। वह जीवन के असमान युद्ध में निहत्था ही जूझ रहा है। सिनेमा सूर्य, चंद्र व सितारों का गीत नहीं है वरन् जुगनू गाथा प्रस्तुत करता है। दु:खद बात यह है कि आम आदमी द्वारा खरीदे हुए सिनेमा टिकट में मात्र दस रुपए की राशि रखरखाव के लिए सिनेमा मालिकों को दिए जाने का आदेश तक जारी नहीं किया जा रहा है, जबकि सरकारी कोष से कुछ नहीं जा रहा है। सिनेमा उद्योग मिल्खा सिंह और ‘हवा हवाई’ के बालक की तरह अपने ही उखड़ते हुए दम पर टिका है।
सिनेविधा के पहले महाकवि चार्ली चैपलिन का 129वां जन्मदिन सोलह अप्रैल को मनाया गया। आम आदमी चैपलिन सिनेमा का केन्द्र रहा है।
जयप्रकाश चौकसे
फिल्म समीक्षक
jpchoukse@dbcorp.in