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सीमित खरीदी, नकदी की कमी, ग्राहकी का अभाव होने से दलहनों में मंदी का रुख

3 वर्ष पहले
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आम उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति घटना ग्राहकी का अभाव, नकदी की तंगी, सरकारी खरीदी नाम मात्र की होने से किसानों के पास दलहनों का स्टॉक रह गया है। दाल मिलों की मांग नहीं के समान होने से मंदी का एक नया दौर शुरू हो गया है। मप्र में खरीदी प्रोग्राम बिगड़ने से भी किसानों को नई समस्या आ रही है। आखिर बैंकों में नकदी की कमी क्यों पड़ गई। जहां तक 2000 रुपए नोट स्टॉक में जाने का सवाल नकदी रखने की जोखिम कोई भी लेना पसंद नहीं करेगा। बाजारों में धन की एक कमी की वजह यह भी है, किसानों की फसलें बाजारों में बराबर मात्रा में नहीं आ सकी। इसके अलावा पिछले वर्षों से भाव भी कम है, जिस मात्रा में भाव कम है। उसी मात्रा में बाजार में धन कम आ रहा है, जिससे बाजारों में धन का प्रवाह कम पड़ गया है। बाजारों में नकदी कैसे बढ़े इस ओर ध्यान नहीं दिया तो स्थिति और अधिक विकट हो सकती है। आने वाले महीनों में मप्र की आटा-मैदा मिलों को गेहूं की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

नए सिरे से मंदी संभव

एक मत है कि पिछले दिनों ऑल इंडिया दाल मिल एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल को बताया गया है कि डब्ल्यूटीओ के अंतर्गत 10 प्रतिशत आयात करना जरूरी है, किंतु कुछ आयातकों ने दलहन आयात के बदले दाल निर्यात के आवेदन लगा रखे हैं। उन्हें स्वीकृति नहीं दी गई है। वास्तव में आयात के बदले निर्यात अधिक फायदेमंद है। आयात खुला करना नए सिरे से मंदी मारने जैसी स्थिति बन सकती है। वर्तमान में दलहनों का जो स्टॉक है। वहीं खप नहीं पा रहा है। नए सिरे से आवक के बाद क्या स्थिति बनेगी, यह कल्पना करना आसान है।

नई खरीदी से हाथ खींचा

एक तरफ केंद्रीय एजेंसियां खरीदी का हल्ला मचा रही हैं, दूसरी ओर खरीदी नाममात्र की होने से किसानों के घरों-गोदामों में दलहनों का स्टॉक जाम हो गया है। सरकारी एजेंसियां यदि ईमानदारी से खरीदी शुरू करें तो बाजारों की स्थिति में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। दाल मिलों और व्यापारियों के पास धन की तंगी आए दिन बढ़ती जा रही है। लगातार घाटे का व्यापार होने से दाल मिलों से स्टॉकिस्टों और आढ़तियों ने नई खरीदी से हाथ खींच रखा है। हाल में आ रही मंदी की एक वजह यह भी बताई जाती है। यह भी सही है कि नोटबंदी के बाद कुछ राज्यों में नकदी की फिर से किल्लत पैदा हो गई है। ऐसी स्थिति में कारोबार सुधरने के बजाय बिगड़ने वाला ही है।

गेहूं का व्यापार अधर में

मप्र में गेहूं का व्यापार अधर में चल रहा है। सरकारी एजेंसियां जो माल नहीं तुलवा रही हैं, ऐसा हलका गेहूं मंडियों में आकर सस्ते भावों पर बिक रहा है। मैदा-आटा मिलें ऐसे गेहूं से चल रही हैं। खरीदी बढ़ने के साथ मंडियों में गेहूं कम मात्रा में आएगा? इस बार समर्थन मूल्य 1735 रुपए है। बोनस के रूप में 235 रुपए दिए जाएंगे। यह सुविधा सीमित अवधि के लिए है। अत: किसान लगातार बेचवाली करके अपना स्टॉक समाप्त कर देगा क्योंकि उसे 2000 रुपए के भाव लेना है। सरकारी खरीदी के बाद बाजारों में तेजी आ सकती है। मप्र की मिलों को संभवत: खाद्य निगम के टेंडरों में जाना पड़ सकता है। यदि खाद्य निगम ने बेचवाली में देरी की तो मप्र की आटा मिलों में ताले लगने जैसी स्थिति बन सकती है। आटे के लिए मालवा-निमाड़ के गेहूं में मांग रहती है। आटा बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां मप्र से ही गेहूं की खरीदी करती हैं। राजस्थान, गुजरात का गेहूं महाराष्ट्र, कर्नाटक और बेंगलुरू तक चला जाएगा। मप्र में गेहूं की शार्टेज बन सकती है।

हलका गेहूं मंडियों में

मप्र में गेहूं का व्यापार अधर में लटका हुआ है। फिलहाल खरीदी एजेंसियां जिस माल को लेने से इनकार कर रही हैं, वह माल मंडियों में आ रहा है। बाजार भाव से बिक रहा है। इस तरह के गेहूं ने मप्र की आटा-मैदा मिलों के पहिए चला रखे हैं, किंतु ये पहिए कब तक चलेंगे, यह कहना कठिन है। गेहूं का समर्थन मूल्य 1735 रुपए है। 265 रुपए बोनस दिया जा रहा है। अत: सरकारी तय तिथि तक अधिकांश किसान गेहूं बेचकर घर बैठ जाएंगे। सरकारी खरीदी बंद होने के बाद किसानों को 2000 रुपए के भाव नहीं मिलना है। यह बात अलग है कि 265 रुपए का भुगतान कब होगा, यह कोई नहीं जानता फिर भी विधानसभा के चुनाव के पूर्व भुगतान करना पड़ेगा अन्यथा भुगतान संकट में पड़ जाएगा। आटा-मिलों को मप्र का गेहूं चाहिए। मप्र के गेहूं से क्वालिटी आटा बनता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खरीदी मप्र के गेहूं में अधिक रहती है। मप्र के गेहूं के नाम से आटे की ब्राडिंग करते हैं।

गेहूं का संकट

अगले कुछ दिनों में राजस्थान, उप्र का गेहूं बाजारों में बिकने आने के बाद मप्र का आटा-मैदा फिलहाल बिक रहा है, वह बंद हो सकता है। इसके अलावा सरकारी तोल समाप्त होने के बाद मंडियों में गेहूं की आवक कमजोर पड़ जाएगी, आटा-मैदा मिलों के सामने माल का संकट खड़ा हो जाएगा। आम धारणा यह है कि गेहूं में यह वर्ष तेजी का हो सकता है। मप्र सरकार की नीतियों की वजह से उपभोक्ताओं पर भी प्रभाव पड़ेगा। वर्तमान में आटा 21 से 24 रुपए किलों बिक रहा है, आने वाले महीनों में 22 से 25 रुपए किलों बिक सकता है। राजस्थान, उप्र के गेहूं की क्वालिटी हाई होती है, जिसका आटा नहीं बनाया जाता है। मप्र का गेहूं उच्च क्वालिटी का होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्राथमिकता के साथ खरीदी करती है। वर्तमान में गेहूं का स्टॉक करने में लगी हुई है। यह भी संभव है। खाद्य निगम इस बार ओपन मार्केट में जल्दी से बिक्री शुरू कर दें। यदि ऐसा होता है तो मप्र की मिलों को गेहूं आसानी से मिल सकेगा। इस बार पंजाब की फसल देरी से आ रही है। अधिकांश गेहूं खाद्य निगम को तोला जाता है।

नकदी की देशव्यापी कमी क्यों?

मार्च के मध्य से यह अहसास होने लगा था कि अप्रैल माह में धन की तंगी बढ़ सकती है, किंतु इस बात की कल्पना ही नहीं की थी नकदी की स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी कि एटीएम भी खाली नजर आएंगे। बैंकों के पास भी तरल पूंजी का अभाव बताया जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में हालात अधिक खराब है। स्थिति तो अब बिगड़ने की आशंका रखी जाती है, जबकि किसानों की फसलें मंडियों में जोरशोर से आना शुरू होगी। अभी तक सरकारी आश्वासन से किसान वर्ग माल रोके बैठे थे। अब पानी सिर पर से गुजरने लगा है। आखिर फसलों को कब तक संभालकर रखें। मंडियों में किसानी माल की आवक बढ़ने पर भाव और भी टूट जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसा आभास हो रहा है कि भारतीय बाजार मंदी की गिरफ्त में आ गए हैं। केंद्र सरकार को मंदी की गिरफ्त से निकालने के उपाय करना होंगे। अर्थशास्त्र में लिखा है कि मंदी के समय सरकार को सुबह गड्ढे खुदवाकर संध्या को भरवाने जैसा काम करना चाहिए, जिससे श्रमिक वर्ग के हाथों में रुपया आए।

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