इस सीजन में शकर उद्योग का घाटा कितनी मात्रा में होगा, इसका आकलन करना कठिन है। रुपयों की जरूरत के लिए मिलें आए दिन भाव घटाकर शकर बेचती जा रही है। जीएसटी पेड शकर 2499 रुपए में बिक गई। दूसरी और इस बार शकर मिलों पर 20 हजार करोड़ रुपए का बकाया निकल गया है। इतना भारी-भरकम उधारी का बोझ का निपटारा कैसे होगा, इसका भी कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। यह भी संभव है। शकर बेचने के बाद कुछ मिलें ताले लगा दे। ऐसी स्थिति में किसानों का रुपया पूरी तरह से डूब सकता है। यदि शकर पर सेंस लगाया तो मिलों के घाटे में और इजाफा होगा। जीएसटी एवं ई-वे बिल लागू होने के बाद महाराष्ट्र की निजी क्षेत्र की कुछ मिलें बिना बिल में शकर बेच रही हैं। ऐसी शकर इंदौर और मप्र के अन्य शहरों में बिक रही है। जीएसटी नंबर का भी खुलकर दुरुपयोग हो रहा है। भारत ने विदेशों से शकर के आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क लगा रखा है, उसके बाद पाकिस्तान से हाल ही में 1908 टन शकर का आयात हो गया।
सेंस में घाटा बढ़ेगा
शकर के घटते भावों को देखते हुए यह अनुमान लगाना कठिन है कि आने वाले महीनों शकर उद्योग की आर्थिक स्थिति क्या होगी और किसानों को मिलों से रुपया मिलेगा यह नहीं। वर्तमान में जीएसटी पेड शकर 2499 रुपए क्विंटल बिकने लगी है ऐसी स्थिति में शुद्ध घाटा कितना हो रहा होगा यह आकलन करना कठिन है। यदि केंद्र सरकार ने आने वाले 15 से 20 दिनों में 5 प्रतिशत सेंस लगा भी दिया तो सरकार को किसानों को भुगतान के लिए थोड़ी-बहुत राशि जरूर एकत्र हो जाएगी, किंतु मिलों का घाटा और बढ़ जाएगा। टेंडर में व्यापारी भाव भरते हैं। उसमें कर सम्मिलित होते हैं। यदि 5 प्रतिशत सेंस लगा तो टेंडर में उससे कम भाव घटाकर भरे जाएंगे। अत: मिलों का घाटा बढ़ने का एक नया रास्ता और खुल जाएगा।
घाटे की जवाबदारी किसकी
अब स्थिति यह बन गई है कि शकर उद्योगों को ही रही नुकसानी की जवाबदारी किसकी होगी? यह अहम् प्रश्न अब सभी के सामने खड़ा है। घाटा आए तो कोई नहीं जानता। मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इस वर्ष के अंत में विधानसभा चुनाव है। शकर मिलों पर किसानी कर्ज का कोई असर नहीं पड़ेगा। कर्नाटक में विपरीत परिस्थिति के बावजूद अन्य दलों से भाजपा ने अधिक सीटें प्राप्त की है। इसके अलावा सर्वाधिक बकाया उप्र एवं महाराष्ट्र में है। इन दोनों राज्यों में चुनाव नहीं है। अगले महीनों में केंद्र सरकार कोई न कोई रास्ता तो निकालेगी। आखिर 20 हजार करोड़ राशि का भुगतान कैसे होगा। शकर उद्योग के लिए चाहे यह राशि अधिक महत्व नहीं रखती हो, किंतु लाखों किसानों के लिए काफी महत्व रखती है। किसानों को चुकता कैसे हो यह सरकार जाने।
5 प्रतिशत का अपवंचन
जीएसटी लगने के पूर्व शकर के कारोबार में सिर्फ 1 प्रतिशत प्रवेश कर का अपवंचन हो रहा था। अब 5 प्रतिशत का अपवंचन खुलकर होने लगा है। महाराष्ट्र की निजी क्षेत्र की मिलें बिना बिल में शकर लंबे समय से बेच रही है। मालवा क्षेत्र के कुछ सोया प्लांट वाले रास्ते का बिल देते थे, अब शकर मिलों ने यही धंधा अपना लिया है। गोदामों पर शकर पहुंचने के बाद बिल फाड़ दिए जाते हैं। कुछ मिलें तो शुद्ध रूप से दो नंबर में शकर बेच रही है। एक निजी क्षेत्र की मिल का नाम बार-बार उछलकर बाहर आ रहा है। बताया जाता है कि एक मिल के पदाधिकारी को ऐसा न करने के लिए किराना बाजार के एक पदाधिकारी ने मना भी किया है, किंतु मिल की कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं आया है। आरटीजीएस के माध्यम से शकर ऐसे गोदामों पर उतर रही है, जिसके जीएसटी नंबर से शकर का लदान ही नहीं हुआ है। ई-वे बिल शकर पर लागू नहीं है। फिर मप्र में आने वाली शकर प्रदेश के बाहर नहीं के समान मात्रा में जाती है। अत: बिना बिल अथवा रास्ते के बिल से शकर का अवैध परिवहन हो रहा है। जीएसटी टीम को शकर के संबंध में विशेष सतर्कता बापरना होगी।
शकर का आयात
डीजीएफटी यह स्पष्टीकरण दे रहा है कि अप्रैल से अभी तक केवल 1908 टन शकर का आयात हुआ है। यह मात्रा देश में कुल उत्पादित 319 लाख टन के सामने कुछ भी नहीं है। डीजीएफटी का कथन सही मान भी लिया जाए तब भी देश में रिकाॅर्ड उत्पादन के बाद आयात होना आश्चर्यजनक बात है। सबसे अधिक उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान से शकर 100 प्रतिशत आयात शुल्क भरकर आ रही है। भारतीय मिलें शुल्क मुक्त शकर का निर्यात नहीं कर पा रही है। डीजीएफटी का कहना है कि 2017-18 में 13,110 टन शकर का आयात हुआ है, जिसकी कीमत 46.8 लाख डॉलर होती है। भारत ने 2017-18 में 17.5 लाख टन शकर का निर्यात किया था। शकर आयात पर महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार को कोसते हुए कहा है कि पाक से आयात की वजह से घरेलू कीमतों में गिरावट आ रही है। आयात नीति से नाराज कुछ व्यक्तियों ने ढाणे के गोदाम पर हमला कर उनके कार्यालयों पर तोड़फोड़ भी की थी।
प्रदेशभर में बिना का व्यापार
ई-वे बिल लागू होने के बाद भी किराना बाजार का माहौल नहीं सुधरा है। वास्तव में सरकारी अधिकारियों की वजह प्रदेश में दो नंबर की मंडियों का तीव्र गति से उदय हुआ है। अब अमरवेल की तरफ चारों तरफ फैल गई है। विभाग के अधिकारियों की सबसे बुरी आदत है कि जांच का केंद्र इंदौर को बनाएंगे और व्यापारियों की जांच में पुरानी फर्मों की तरफ पहली नजर जाती है। जांच अधिकारियों को यह मालूम होना चाहिए कि ऐसे हजारों व्यापारी हैं जो करोड़ों का कारोबार वर्षों से कर रहे हैं, किंतु जांच की निगाह से दूर हैं अर्थात् कर अपवंचन बड़ी मात्रा में पहल भी हो रहा था आज भी हो रहा है।
उद्योग का उत्पादन अनुमान सही नहीं निकला
इस बार शायद उद्योग उत्पादन अनुमान लगाने में गच्चा खा गया है। सीजन के पूर्व में 250 से 255 लाख टन उसके बाद 290 से 300 लाख टन का अनुमान लगाया था और अब उत्पादन 319 लाख टन के आसपास हो गया है। इतना भारी-भरकम अंतर शकर उद्योग को गहरे घाटे में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। जानकारों का मत है कि जब इतना भारी घाटा दिख रहा था, तो मिलों ने उत्पादन क्यों जारी रखा? या उनकी नीयत में स्पष्ट हो गया होगा कि जब होगा ही नहीं तो देंगे कहां से। घाटे को देखते हुए मिलें बंद कर देना थीं, जिससे सरकार किसान दोनों सस्ते भाव पर गन्ना देने पर सहमत हो जाती। पिछले दिनों किसानों ने गुड़ उत्पादकों को 150 से 160 रुपए क्विंटल में गन्ना दिया है। वर्तमान परिस्थितियों में मिलें, किसान एवं सरकार सभी परेशानी में आ गई है। सूझसमझ नहीं पड़ रही है कि आखिर क्या किया जाए। नकदी की जरूरत के लिए मिलें प्रत्येक भावों पर नि:संकोच शकर बेचे जा रही है और अब तो घाटे के नाम से भी असंतोष व्यक्त नहीं कर रही है।