ठियोग क्षेत्र के धरेच व चियोग क्षेत्र के देवी देवताओं जईश्वरी देवी व देवता सोगू ने अपने कलैणों के साथ रविवार को कांगड़ा के बज्रेश्वरी मंदिर में पूजा अर्चना की । इससे पहले प्राचीन देव परपंरा के अनुसार देवी देवता को नगरकोट कांगड़ा में बने पवित्र कुंड में स्नान करवाया गया। इस स्नान में देवी देवता अपने कलैणों की भूलचूक के लिए भी पानी की छाले लेते हैँ। जितने कलैणों ने क्षमा की याचना अथवा नगरकोट के लिए मानता की होती है उतनी ही डुबकियां ली जाती हैं। उल्लेखनीय है कि देवी देवता ने 12 मई को अपने कलैणों के साथ नगरकोट कांगड़ा के लिए पैदल यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा में गए दोनों देवी देवताओं में भाई बहन का रिश्ता है।
वापिसी यात्रा शुरू : रविवार को कांगड़ा के बज्रेश्वरी मंदिर से पूजा अर्चना के बाद देवी देवता व कलैणों ने तीन बजे दोपहर बाद वापिसी पैदल यात्रा शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि आने वाले शनिवार या रविवार तक वे वापिस पहुंच जाएंगे। अपने ईष्टों की अगवानी के लिए 1500 से अधिक कलैणे परिवार फागू में एकत्र होंगे जहां से देवता सोगू महाराज व देवी जईश्वरी अपनी अपनी देवठियों के लिए रवाना हो जाएंगे। इस यात्रा के पूर्ण होने के बाद एक माह में इन देवठियों में शांद यज्ञ होगा और रिहाली मेलों का आयोजन किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि देवी देवता की इस तीर्थ यात्रा के समय के दौरान कलैणे विभिन्न नियमों का पालन करते हैं जो सदियों से निभाए जा रहे हैं।
आस्था
ठियोग क्षेत्र के देवी देवताओं ने पवित्र कुंड में स्नान के बाद किए माता बज्रेश्वरी के दर्शन
वापिसी यात्रा में कांगड़ा के समीप विश्राम करते साथ गए कारदार व कलैणे।
बड़ी संख्या में कांगड़ा पहुंचे कलैणे
देवी व देवता के रविवार को नगरकोट स्नान के समय पैदल गए 76 कारदारों व कलैणों के अलावा बड़ी संख्या में कलैणे अपने वाहनों में कांगड़ा पहुंचे थे और इस आयोजन को उन्होंने अपनी आंखों से देखा। इनमें बड़ी संख्या में युवा कलैणे भी थे जो प्राचीन देव परंपराओं को जानने में रूचि रखते हैं। देवताओं के साथ गए कढरब गांव के युवा योगेश ने बताया कि पैदल गए यात्रियों में 40 प्रतिशत युवा हैं क्योंकि हर घर से एक व्यक्ति ही साथ जा सकता है इसलिए कम संख्या रही।
नई प्रथाओं के आरंभ व पुरानी छोड़ने की अनुमति : देव परंपरा के अनुसार कांगड़ा के बज्रेश्वरी मंदिर में इन देवी देवताओं के जाने का कारण पुरानी किसी परंपरा हो कलैणों के आग्रह पर छोड़ने व नई किसी प्रथा को शुरू करने की अनुमति लेना भी होता है। इन देवी देवताओं की यह यात्रा 22 साल बाद हुई है इस दौरान हुए बदलावों के बारे में वहां प्रार्थना की जाती है।