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विकास के लिए 20 हजार खत अफसरों को लिखे तो लोग कहने लगे चिट्‌ठी वाले दादाजी

3 वर्ष पहले
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राजीव रंजन/ प्रशांत रावत। टीकमगढ़

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवानदास दुबे (95 साल) विकास और लोगों की समस्याओं के लिए अब तक 20 हजार से ज्यादा चिट्‌ठियां अफसरों को लिख चुके हैं। इन्हें मप्र के टीकमगढ़ जिले में गांधीजी के नाम से पहचाना जाता है। कुछ लोग इन्हें चिट्‌ठी वाले दादाजी कहकर पुकारते हैं। चिट्‌ठी की बदौलत जिले को कई सौगातें दे चुके हैं। इनकी चिट्‌ठी का ही कमाल है कि देश की पहली नदी-तालाब जोड़ो परियोजना का टीकमगढ़ के हरपुरा में क्रियान्वयन हो सका।

एमपी-यूपी बार्डर को जोड़ने वाले पुल में भी अहम योगदान है। आज जहां ईमेल ओर वाट्सएप प्रचलन में हैं, ऐसे में भगवानदास जनप्रतिनिधि और अधिकारियों को अब भी पत्राचार करते हैं। वह 20 हजार से अधिक चिट्ठियां लिख चुके हैं। आज भी उनका जज्बा कम नहीं है। फुर्तीले इतने हैं कि युवा भी हार मान जाएं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके घर में चिट्ठियों का अंबार लगा है। भगवानदास लंबे समय तक गांधीजी के स्वराज आंदोलन से जुड़े रहे। उस समय उन्हें डाक बांटने का काम सौंपा गया था, तभी से चिट्‌ठी लिखने में महारत हासिल है।

95 साल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवानदास दुबे का टीकमगढ़ के विकास में अहम योगदान, देश की पहली नदी-तालाब जोड़ो परियोजना जिले को मिली

चिट्‌टी बांटने पर गए थे

6 माह के लिए जेल

इन कामों में रहा अहम योगदान

अंग्रेजी शासनकाल में एक बार डाक बांटते वक्त नौगांव में पकड़े भी गए थे। उस समय 6 माह की सजा हुई थी। भगवानदास दुबे की कर्मठता और लोकप्रियता के चलते सन 1972 में कांग्रेस ने टिकट का ऑफर दिया, लेकिन उन्होंने कभी राजनीति करने का उनके मन में विचार नहीं आया। उनका मानना था समाज के बीच ही रहकर लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा की जा सकती है।

इनके द्वारा कराए गए विकास कार्य जिले तक ही सीमित नहीं रहे। इन्होंने मप्र के ग्वालियर में 700 एकड़ का आलू बीज उत्पादन केंद्र स्थापित कराने में अहम भूमिका निभाई। टीकमगढ़ जिले में एनएससी का सेंटर स्थापित कराया। एक समय जिले में ऐसा था जब कोई डीजल पंप के बारे में नहीं जानता था, तब भगवान 1950 में नदी से पानी क्षेत्र में लाने के लिए पहला डीजल पंप लेकर आए। सन 1956 में जेकोस्लाविया कंपनी द्वारा निर्मित ट्रैक्टर लाकर किसानों को उपलब्ध कराया। उन्होंने अपनी सारी उम्र कृषि को लाभ का धंधा बनाने एवं किसानों के हित के कार्य करने में लगा दिया।

यूं रहा देश की पहली नदी-तालाब जोड़ो परियोजना का सफर

राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम आजाद के एक भाषण में उन्होंने बताया कि वर्षा का 75 परसेंट पानी नदियों से होता हुआ समुद्र में पहुंच जाता है, जिसका हम सब कोई उपयोग नहीं कर पाते। अब्दुल कलाम की यह बात भगवानदास दुबे के दिमाग में घर कर गई। उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों के लिए नदी तालाब जोड़ो योजना को बनाना शुरु कर दिया। संपूर्ण दस्तावेज एवं नक्शा तैयार कर 12 तालाबों की सूची सन 2005 में एक पत्र के माध्यम से सिंचाई विभाग को भेजी। तत्कालीन सिंचाई मंत्री अनूप मिश्रा ने पत्र के माध्यम से उन्हें मिलने बुलाया। सन 2007 में उनके पास सिंचाई विभाग की एक रिपोर्ट पहुंची, जिसमें बताया गया कि इन 12 तालाबों की भौगोलिक स्थिति नदी से जुड़े जाने योग्य नहीं है, यह बहुत ऊंचाई पर स्थित है। इसके बाद भी भगवानदास ने हार नहीं मानी। बराबर पत्र लिखते रहें और जानकारी जुटाकर भेजते रहे। सन 2008 में सिंचाई मंत्री मंत्री जयंत मलैया ने उन्हें पत्र द्वारा सूचित किया कि वह इस योजना पर अवश्य ही क्रियान्वयन करेंगे। इसके बाद टीकमगढ़ में 25 इंजीनियरों की टीम भेजी और प्रोजेक्ट बनाकर क्रियान्वित कराया।

पहली चिट्‌ठी 1942 में अौर आखिरी 13 फरवरी 2018 को लिखी

सन 1942 में जब यहां की रियासतें अंग्रेजों के अधीन थीं। अंग्रेजों ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था। उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्ति की जमीन, सोना-चांदी जब्त कर लिया जाता था। बंदी तक बना दिया जाता था। लोगों पर हो रहे अंग्रेजी अत्याचार के विरोध में उन्होंने पॉलीटिकल एजेंट को चिट्‌ठी लिखी थी। भगवानदास की मार्मिक चिट्ठी का इतना असर हुआ कि पॉलिटिकल एजेंट को रियासतों को निर्देश देना पड़ा। इसके बाद जमीन और सोना-चांदी नहीं छीनी गईं। उन्होंने वर्तमान में 13 फरवरी 2018 को भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आखिरी चिट्ठी लिखी। जिसमें उन्होंने हरपुरा नहर की विसंगतियों की तरफ ध्यान देने की बात कही है।

भारतीय संस्कृति भूल रहे युवा

भगवानदास का कहना है कि वर्तमान में चिट्ठी का चलन जरुर कम हो गया है, लेकिन उसका प्रभाव बरकरार है। मशीनी दौर में भारत का युवा भारतीय संस्कृति को भूलता जा रहा है।

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