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अक्षय तृतीया पर झंडारोहण और कनक दंडवत यात्रा से तीन दिवसीय वार्षिक मेला हाेगा शुरू
श्री बद्री विशाल धाम पर अक्षय तृतीया पर तीन दिवसीय वार्षिक मेला का शुभारंभ कनक दंडवत यात्रा व ध्वजारोहण के साथ होगा। वर्षों से चली आ रही परम्परा के अनुसार नटवाड़ा ठिकाना के गढ़ के दीवान खाने में सात अनाजों का पूजन कर लक्ष्मण करण राठौड़ की ओर से मन्दिर के शिखर पर ध्वजा फहराई जाकर मन्दिर के शिखर पर बैठने वाले पक्षी के आधार पर नव संवत्सर का शगुन देखा जाएगा। मन्दिर महन्त तेज भारती बाबा ने बताया कि अक्षय तृतीया महोत्सव को लेकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आखातीज के मेले का आयोजन होगा। सरपंच पिन्टू बैरवा ने बताया कि गांव नटवाड़ा में श्री बद्रीविशाल धाम पर अक्षय तृतीया के अवसर पर शगुन देखने की परम्परा मारवाड़ क्षेत्र के राठौड़ वंशजों के यहां आने के साथ शुरू हुई हैं व तब से अब तक मन्दिर के शिखर पर ध्वजा फहरा कर पक्षी के बैठने के आधार पर नव संवत्सर का शगुन देखा जा रहा हैं उन्होंने बताया कि इसके अलावा भगवान को प्रसाद के रूप में चढ़ने वाली चने के दाल के गलने एवं भगवान श्री बद्री विशाल के चरणों से गुजरने वाले जल से हुई हरियाली से भी शगुन देखा जाता हैं।
संतअर्जुन दास ने की थी श्री बद्रीनाथ भगवान की मूर्ति की स्थापना: गांव नटवाड़ा में श्री बद्रीनाथ भगवान की मूर्ति की स्थापना मारवाड़ के एक परम भक्त संन्यासी गुसाई संत श्री अर्जुन दास ने की। वे हर साल पैदल यात्रा कर बीहड़ जंगलों से होकर अपने अराध्य देव श्री बद्रीनाथ भगवान के दर्शन करने नार्थ बद्रीकाश्रम में जाया करते थे। कालांतर में जब वे वृद्ध हो गए व वृद्धावस्था के कारण क्षीण काया से वे उतना लम्बा सफर करने में असमर्थता महसूस करने लगे तो उन्होंने प्रार्थना की कि अब काफी बूढ़ा हो गया हुं व इस साल मेरा यह अंतिम दर्शन हैं इस प्रार्थना से अभिभूत होकर सपने में दर्शन देकर कहा कि मेरी एक मूर्ति तप्त कुण्ड में हैं एवं वहां मैं तुम्हे एक फूल के रूप में तैरता हुआ दिखाई दूंगा।
रोज ढह जाता था मन्दिर: आज से लगभग 1100 वर्ष पहले मारवाड़ के संन्यासी गुसाई संत श्री अर्जुनदास महाराज ने तप्त कुण्ड में तैरते हुए एक कमल के फूल से बनी मूर्ति को पराना गांव में लाकर मन्दिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया लेकिन अर्जुनदास महाराज द्वारा दिन में किया गया मन्दिर का निर्माण रात को ढह जाता था फिर संत गोसाई ने भगवान से निवेदन किया कि दिन में किया गया निर्माण कार्य ध्वस्त क्यो हो जाता हैं तब भगवान बद्री विशाल ने सपने में आकर अर्जुनदास महाराज को कहा कि यहां मुगलों का राज होने के कारण मेरा मन्दिर यहां नहीं बन सकता हैं इसलिए यहां से एक कोस की दूरी पर एक स्थान हैं जहां स्वयं नाटेश्वर महादेव विराजमान हैं वहा मेरा मन्दिर बनवाना तब मूर्ति को नटवाड़ा लाकर श्री बद्री विशाल भगवान के मन्दिर का निर्माण करवाया गया मन्दिर के राव बजरंग लाल द्वारा रचित जागा पोथी के अनुसार जब तक मन्दिर का निर्माण कार्य चलता रहा तब तक रोज प्रातः भगवान की आरती करने से पूर्व पुजारी को एक सोने का सिक्का मिलता था।
चमत्कारिक है दाल का ताम्र पात्र मे डालते ही गलना: श्री बद्री विशाल भगवान को भीगी हुई दाल एवं पतासे का प्रसाद चढ़ाया जाता हैं इस प्रसाद का यह चमत्कार हैं कि अक्षय तृतीया के अवसर पर ताम्र पात्र में दाल को डालकर तुरंत निकालने पर ही दाल ऐसे भीग जाती हैं जैसे घंटो पूर्व भिगोई गई हो। इस चमत्कार को देखकर टोंक के नवाब मुसलमान होते हुए भी उन्होंने भगवान को दाल का भोग लगाने के लिए चने की खेती करने के लिए मन्दिर को भूमि दान की थी ।
भगवान विष्णु का अवतार हैं अखण्ड ज्योति: श्री बद्री विशाल भगवान के मन्दिर में उत्तर-पश्चिम भाग में आदिकाल से अखण्ड़ ज्योति जल रही हैं। इस ज्योति का कंपित होना, मन्द होना, या बुझना अशुभ एवं विपदा का संकेत हैं। मन्दिर में जल रही अखण्ड ज्योति को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता हैं इसके दर्शन मात्र से कई बीमारियां ठीक हो जाती हैं एवं वर्ष भर हजारों श्रद्धालु इस अखण्ड़ ज्योति के दर्शन कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करने आते हैं।
स्वयं प्रकट हुए नाटेश्वर महादेव: इतिहासकार अर्जुन सिहं राठौड़ ने बताया कि श्री बद्री विशाल मन्दिर के निर्माण के समय भगवान नाटेश्वर महादेव स्वयं प्रकट हुए थे। आज भी भगवान श्री बद्री विशाल से पहले नाटेश्वर महादेव की आरती होती हैं एवं इसलिए इस गांव का नाम पहले नाटेश्वरी नगरी पड़ा एवं कालांतर में अपभ्रंश होकर नटवाड़ा नाम पड़ा।
नटवाड़ा. बद्री विशाल धाम मन्दिर में विराजित बद्रीनाथ की प्रतिमा।