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पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति का पालन करने वाला जैन सन्यासी

3 वर्ष पहले
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जैन सन्यासी वही होता है जो पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति इन 13 नियमों का पालन करता है। अहिंसा नियम के अंतर्गत जैन साधु भोजन नहीं बनाते वह भिक्षा से भोजन ग्रहण करते है।

यह बात अक्षय तृतीया पर्व पर मुनि किशनलाल ने कही। उन्हाेेंने भगवान ऋषभ के प्रसंगों को उल्लेखित करते हुए बताया कि जब भगवान ऋषभ सन्यास लेकर साधना के लिए कैलाश पर्वत की ओर जो रहे थे तो उनके साथ चार हजार राज्याधिकारी, सेनापति आदि भी सन्यासी दीक्षित हो गए।

भगवान ऋषभ को भी एक वर्ष तक कष्ट भोगना पड़ा उनको भिक्षा में भोजन नहीं मिला, क्योंकि लोग उस समय भिक्षा की विधि को जानते नहीं थे, लोग उनको हीरा-पन्ना, माणक और अपनी पुत्रियों को भेंट करते किंतु रोटी का दान नहीं दे पा रहे थे। एक वर्ष के पश्चात श्रेयांस नाम के व्यक्ति ने स्वप्न में देखा कि वह पिछले जन्म में सन्यासी था। ऋषभदेव को भिक्षा के लिए निवेदन किया। भगवान ऋषभ उनके घर पधारे और उस समय खेतों से इक्षु (ईख) रस के घड़े आये हुए थे। श्रेयांस कुमार ने इक्षु रस भगवान को दान में दिया। अहो दानम्, अहो दानम् का घोष गूंजा। उसी दिन से इस पर्व का नाम अक्षय तृतीया पड़ा। आज भी लोग जैन साधु-संतों को ईक्षु रस का पारणा करवाते हैं अर्थात ईक्षु रस का दान करते हैं। मुनि ने बताया कि आज भी जैन सन्यासी के लिए भोजन नहीं बनता है। गृहस्थी के घर जो बना हुआ भोजन है उनमें से थोड़ा लेकर अपनी जीवन चर्या चलाते हैं। साधु जीवन में कष्ट आता है उसे समभाव से सहन करते हैं। आज भी तेरापंथ में साधुचर्या के 13 नियम का पालन करते हैं।

मुनिश्री ने बताया कि किसी भी व्यक्ति की दीक्षा उसके माता-पिता की लिखित और मौखिक स्वीकृति के पश्चात ही हजारों लोगों के बीच दी जाती है। कोई बालक अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने पूर्वजन्मों के संस्कारों से प्रेरित हो सोच-समझ इच्छा से दीक्षित होता है उस पर किसी का कोई दबाव नहीं होता। किसी धर्म की विधि को स्वीकार करना भारत के संविधान की स्वीकृति है, कोई उसमें बाधा डालता है, यह उसकी स्वतंत्रता का हनन है फिर चाहे वह कोई व्यक्ति या संस्था है।

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