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कर्नाटक जैसा ड्रामा 51 साल पहले कांग्रेस ने राजस्थान में किया था

3 वर्ष पहले
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कर्नाटक जैसा एक खेल 51 साल पहले राजस्थान में हुआ था। बात 1967 की है। राज्य का चौथा चुनाव था। कांग्रेस को 184 सदस्यों वाली विधानसभा में महज 88 सीटें मिली थीं। बहुमत के लिए 93 सीटें चाहिए थीं। सभी 95 गैरकांग्रेसी विधायकों ने चुनाव के बाद संयुक्त विधायक दल गठित कर लिया और अपनी दावेदारी पेश कर दी। लेकिन राज्यपाल डॉ. संपूर्णानंद ने 4 मार्च को इस आग्रह को ठुकरा दिया और उदयपुर से विधायक चुने गए और इस चुनाव से पहले सीएम रहे मोहनलाल सुखाड़िया को सीएम पद की शपथ लेने का न्योता दे दिया। इससे विरोधी दलों और आम लोगों ने सड़कों पर आकर विराेध शुरू कर दिया और अागजनी, पथराव तथा टकराव के बीच पुलिस की गोली से नौ लोग मारे गए और 49 घायल हो गए। इसके बाद राजधानी जयपुर में कर्फ्यू लगा दिया गया था। शेष | पेज 11

राष्ट्रपति के सामने विधायकों की परेड कराई तो भी न्याय नहीं

राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष कैलाश मेघवाल बताते हैं- उस समय डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राष्ट्रपति थे। राज्य के संयुक्त विधायक दल के बहुमत से भी ज्यादा विधायकों की परेड राष्ट्रपति भवन में करवाई गई, लेकिन तब भी न्याय नहीं मिला। अगर उस समय राज्यपाल ने संयुक्त विधायक दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया होता तो महारानी गायत्री देवी या महारावल लक्ष्मणसिंह का मुख्यमंत्री बनना तय था।

दल बदलने वाले पहले विधायक थे रामचरण

राज्य के राजनीतिक इतिहास में सबसे पहले दलबदल करने वाले विधायक जनसंघ के रामचरण थे। इसके बाद ही बाकी विधायकों ने दल बदला। उन दिनों दलबदल विरोधी कानून नहीं था।

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