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सीएचसी-पीएचसी में नहीं हो रहा दुष्कर्म पीड़िताओं का मेडिकल, संसाधन होने के बाद भी कर देते रेफर

3 वर्ष पहले
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जिले की दुष्कर्म पीड़िताओं को मेडिकल करवाने के लिए भी दर-दर भटकना पड़ रहा है। ऐसे कई केस जिले में होते हैं लेकिन पीएचसी और सीएचसी में पीड़िताओं का मेडिकल नहीं किया जा रहा है। ज्यादातर केंद्रों पर महिला डॉक्टर के साथ तमाम सुविधा संसाधन भी हैं उसके बाद भी पीड़िताओं को एमबी अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों के केस में पीड़ित महिलाओं को भारी परेशानी होती है। जिले के 27 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और 98 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में कुल 240 चिकित्सक हैं जिनमें 46 महिला चिकित्सक हैं। ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें दुष्कर्म की पीड़ा झेल रही पीड़िता को सलूंबर, खेरवाड़ा, ऋषभदेव, कोटड़ा, सराड़ा, झाड़ोल जैसे दूरदराज क्षेत्रों से भी मेडिकल करवाने उदयपुर एमबी हॉस्पिटल आना पड़ता है।

जिले के 100-150 किलोमीटर दूर इलाकों से भी दुष्कर्म पीड़िताओं को मेडिकल के लिए लाना पड़ रहा है उदयपुर, पीड़िता के साथ पुलिस भी होती है परेशान, नहीं हो रही मॉनिटरिंग

एमबी के मेडिकल ज्यूरिस्ट बोले- पेशियों से बचने पीएचसी-सीएचसी के चिकित्सक कर देते हैं रेफर

आरएनटी में 9 मेडिकल ज्यूरिस्ट, उसमें महिला डॉक्टर एक भी नहीं

दूसरी बड़ी समस्या यह है कि संभाग के सबसे बड़े आरएनटी कॉलेज में 9 मेडिकल ज्यूरिस्ट हैं लेकिन इनमें एक भी महिला डॉक्टर नहीं हैं। ऐसे में दुष्कर्म पीड़िताओं को यहां से जनाना अस्पताल भेज दिया जाता है। जनाना अस्पताल में भी इसके लिए कोई अलग एक्सपर्ट महिला चिकित्सक नहीं है। दूसरे कामों में व्यस्त महिला चिकित्सक ही पीड़िता के ब्लड, वजाइना सैंपल लेकर जांच करती है। वही महिला चिकित्सक मेडिकल जांच फॉर्म को भरकर मेडिकल ज्यूरिस्ट को भेज देती हैं। फिर रिपोर्ट के आधार पर मेडिकल ज्यूरिस्ट राय लिखते हैं।

माह में 40 से 50 पीड़िता पीएचसी-सीएचसी से रेफर होकर एमबी आती ं

एमबी हॉस्पिटल के मेडिकल ज्यूरिस्ट चिकित्सकों ने बताया कि महीने में लगभग 50 ऐसे केस होते हैं जो जिले से यहां रेफर किए जाते हैं। रेफर करने के पीछे भी कोई स्पष्ट कारण नहीं होते। चिकित्सकों का कहना है कि पीएचसी-सीएचसी के चिकित्सक सिर्फ इसलिए रेफर कर देते हैं क्योंकि वे कोर्ट पेशियों से बचना चाहते हैं।

अगर पीएचसी-सीएचसी में ही हो मेडिकल तो पीड़िता के साथ प्रशासन को राहत

जिले में 100-150 किलोमीटर दूर इलाकों से भी पीड़िता को पुलिस जाब्ते के साथ उदयपुर आना पड़ता है। वह पहले से ही पीड़ा में होती है और उसे यहां भी भटकना पड़ता है।

पुलिस जाब्ते में कई जवान दिनभर लगे रहते हैं और उन्हें पीड़िता की सुरक्षा को लेकर भी विशेष ध्यान रखना होता है।

मेडिकल करने वाली महिला चिकित्सक और मेडिकल ज्यूरिस्ट को कम से कम दो बार ग्रामीण क्षेत्रों में पेशियों पर जाना पड़ता है। पीएचसी-सीएचसी के चिकित्सक वहीं जांच कर लें तो उन्हें पास में ही कोर्ट जाना होगा।

पीड़िता के उदयपुर आने और फिर डॉक्टर के संबंध में कोर्ट जाने से सरकार के पैसे भी काफी खर्च होते हैं।

दूर-दराज क्षेत्रों में पेशियों पर जाने से आरएनटी के मेडिकल ज्यूरिस्ट का पूरा दिन निकल जाता है। एमबी हॉस्पिटल के पोस्टमार्टम सहित अन्य मेडिकल और आरएनटी मेडिकल कॉलेज के शिक्षण कार्य प्रभावित हाेता है। यहां ऐसे भी डॉक्टरों की कमी है।

जिन सीएचसी-पीएचसी पर महिला चिकित्सक हैं, वहां दुष्कर्म पीड़िता का मेडिकल हो जाता है। महिला चिकित्सक के नहीं होने पर महिला नर्स की उपस्थिति में पीड़िता अगर डॉक्टर से मेडिकल करवाने की अनुमति देती है तो ही वहां मेडिकल होता है, अन्यथा पीड़िता को उदयपुर एमबी हॉस्पिटल रेफर किया जाता है। - संजीव टांक, सीएमएचओ, उदयपुर

सीजेरियन केस भी कर देते रेफर

सीएचसी पर स्त्री एवं प्रसूती रोग विशेषज्ञ, शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ, एनेस्थेटिक होने के बावजूद प्रसूताओं को सीजेरियन के मामले में लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसा कोई केस आते ही डॉक्टर उसे उदयपुर रेफर कर देते हैं। ऐसी कई शिकायतें प्रसूताओं के साथ उनके परिजनों ने की है। आंकड़ों को देखें तो एक साल में मावली सीएचसी में सिर्फ 4, खेरवाड़ा में 11 और सलूंबर सीएचसी पर 24 सिजेरियन ही किए गए। शिकायत के बाद जिला प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य अधिकारी (आरसीएचओ) डॉ. अशोक आदित्य ने रिपोर्ट मांगी है।

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