कार में हमेशा रखते हैं स्लीपर, बिस्किट-टॉफी के कार्टून, रोड पर कोई खाली पांव दिखे तो निशुल्क में बांटते हैं, हजार से अधिक बच्चों-मजदूरों को बांट चुके
ये हैं शहर के बेदला निवासी व्यवसायी धर्मेंद्र वावंला। इन्हें आस-पास के लोग और स्कूली बच्चे चप्पल वाले अंकल के नाम से जानते हैं। क्योंकि वे पिछले कई सालों से झुग्गी बस्तियों, स्कूलों और फैक्ट्रियों में जाकर जरूरतमंदों को निशुल्क में स्लीपर बांटते हैं। यही नहीं, स्कूली बच्चों के चेहरे पर खिलखिलाहट लाने के लिए बिस्किट और टॉफियां भी बांटते हैं। धर्मेंद्र अपनी कार में हमेशा स्लीपर और बिस्किट-टॉफी से भरे कार्टून रखते हैं। उन्हें सड़क के आस-पास बिना स्लीपर के कोई काम करता हुआ दिखाई देता है तो रुककर उनसे मिलते हैं और स्लीपर दे देते हैं। वे पिछले चार साल में एक हजार से अधिक लोगों को स्लीपर बांट चुके हैं। वे बताते हैं कि तपती धूप में अभी भी ग्रामीण इलाकों में काफी संख्या में बच्चे और मजदूर स्कूल और फैक्ट्री जाते हैं जिससे उनके पैरों में छाले पड़ जाते हैं। छोटी सी मदद से उनके चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश भर है।
शहर के व्यवसायी की अनूठी पहल, बोले- जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश है
लोग सोचते रह जाते, कोई अनजान आया और हाथों से नए स्लीपर पहनाकर चला गया, कहते हैं स्लीपर वाले अंकल,
धर्मेंद्र बताते हैं कई बार रोड किनारे किसी परिवार या उनमें किसी बच्चे को खाली पांव जाते देखते हैं तो वे रुककर जैसे ही स्लीपर दिखाने लगते हैं, लोग यह कहते हुए स्लीपर देखने से इनकार कर देते हैं कि उनके पास पैसे नहीं है। धर्मेंद्र उन्हें जैसे ही कहते हैं कि यह फ्री में है तो उन्हें विश्वास नहीं होता। फिर वे खुद बच्चों के पांव पकड़ उनकी साइज के स्लीपर पहनाकर रवाना होते हैं तो बच्चों के चेहरे पर जो मुस्कान होती है, वह सुकून मुझे यह काम करने के लिए प्रेरित करता है।
बेजुबानों के लिए भी कई जगहों पर बनाई पानी की टंकी, रोज दाना-पानी की व्यवस्था करते
धर्मेंद्र और उनकी प|ी अपने इलाके के आस-पास पशु-पक्षियों के लिए भी काम करते हैं। उन्होंने कई जगहों पर पक्षियों के पानी के लिए टंकी का निर्माण कराया। रोज इन जगहों पर जाकर वे बेजुबानों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था भी करते हैं।
इनके पिता भी फैक्ट्री में मजदूरों को बांटते थे स्लीपर
धर्मेंद्र बताते हैं कि उनके पिता भंवरलाल वावंला सिविल कांट्रेक्टर थे। उनकी साइट पर काफी संख्या में ऐसे लोग भी काम करने आते थे जो गरीबी के कारण चप्पल तक नहीं खरीद पाते थे। उनकी आंखों के सामने काम करते-करते कई मजदूरों के पैरों से खून तक निकल आता था। यह देख उनसे रहा नहीं जाता था और वे मजदूरों को स्लीपर लाकर देते थे। धर्मेंद्र बताते हैं कि पिताजी के कामों से ही उन्हें प्रेरणा मिली। अब वे कोशिश करते हैं कि बच्चों-मजदूरों को छोटी-छोटी मदद कर उनके चेहरे पर मुस्कान ला सके।