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शिप्रा में प्रवाह के लिए फिर सेवरखेड़ी डेम की जरूरत बताई

3 वर्ष पहले
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सिंहस्थ 2028 के पहले शिप्रा में प्राकृतिक जल प्रवाह के लिए केंद्रीय जल आयोग ने एक बार फिर सेवर खेड़ी डेम की अनुशंसा की है। आयोग शिप्रा में प्रवाह के लिए ‘शिप्रा शुद्धिकरण एवं पुनर्जीविकरण प्रोजेक्ट’ तैयार करेगा। इसकी डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने के लिए गुरुवार को होने वाली शिप्रा शुद्धिकरण न्यास की बैठक में कंसल्टेंट नियुक्त करने पर मंथन होगा। आयोग ने उज्जैन, इंदौर, धार और देवास जिले में सर्वे के बाद 13 ऐसे बिंदु तय किए हैं जिन पर काम करने से शिप्रा में प्राकृतिक जल प्रवाह लाया जा सकता है।

केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने करीब एक साल पहले उज्जैन यात्रा के दौरान शिप्रा को पुनर्जीवित करने के लिए केंद्र सरकार के माध्यम से स्थायी प्रोजेक्ट बनाने का आश्वासन दिया था। इसके बाद 24 मार्च 2017 को गंगा संरक्षण एवं जल संसाधन मंत्रालय दिल्ली ने इसके लिए आदेश जारी किए। 10 अप्रैल 2017 को शिप्रा को प्रवाहमान बनाने के लिए सर्वे के निर्देश केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय से जारी हुए। केंद्र सरकार के नदी संरक्षण मंत्रालय ने सर्वे के लिए उच्च स्तरीय विशेष अध्ययन दल भेजा। इस सर्वे दल ने 12 अक्टूबर 2017 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। जिसके आधार पर अब डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) बनाई जाएगी। केंद्रीय जल आयोग ने अपने सर्वे में सेवरखेड़ी में डेम बनाने की अनुशंसा की है। गौरतलब है कि सेवरखेड़ी डेम की योजना बनी थी लेकिन राजनीतिक कारणों से रुक गई थी।

अब तक 532 करोड़ रु. खर्च लेकिन शिप्रा जस की तस

शिप्रा को प्रदूषण मुक्त और प्रवाहमान बनाने पर सरकार 15 साल में 532 करोड़ रु. खर्च कर चुकी है लेकिन शिप्रा जस की तस है। 432 करोड़ की नर्मदा-शिप्रा लिंक योजना भी इसे प्रदूषण से नहीं बचा पाई। सिंहस्थ 2004 के पहले 14 करोड़ की नदी संरक्षण योजना, सिंहस्थ 2016 के पहले 80 करोड़ की कान्ह डायवर्सन योजना लागू हो चुकी है। नालों को रोकने के लिए पीएचई की योजना पर भी 6 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी शिप्रा की हालत नहीं बदली। कान्ह कान्ह और गंदे नालों का पानी शिप्रा में मिलना बंद नहीं हुआ।

ये तीन बड़े काम, जिनसे शिप्रा होगी प्रवाहमान

सुधार : तालाब बनें, गंदे नाले रुकें

शिप्रा के जलग्रहण क्षेत्र में 128 तालाबों का सुधार, नवीनीकरण और पुनर्जीवित करना। 40 प्रतिशत तालाब में पानी नहीं भर पाता, टूटे हैं या मृत हो गए हैं।

शिप्रा में मिलने वाले गंदे नालों और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को साफ करने की व्यवस्था करना।

नदी की सफाई तथा काई और जलकुंभी से खाद बनाने के लिए प्रोत्साहित करना व कम मूल्य में देना।

निर्माण : हर गांव में पानी रोकने की व्यवस्था

तीन नए बड़े तालाब या स्टापडेम जिनसे एक साल में 2 क्यूमैक्स पानी (घन मीटर प्रति सेकंड) नदी में प्रवाहित हो सके। इसके लिए भुंडवास में तालाब, सेवरखेड़ी में डेम, उज्जैनी में तालाब बनेगा।

शिप्रा से जुड़े हर गांव में कम से कम एक तालाब बनेगा ताकि गांववासी शिप्रा से पानी नहीं लें।

गैबियन, स्ट्रक्चर, परकोलेशन टैंक आदि बनाना। बारिश का पानी धरती में उतारने के लिए सभी उपाय होंगे।

अभियान : पौधारोपण, कम पानी की फसलें

शिप्रा के जलग्रहण क्षेत्र में कटाव रोकने व कम पानी में उत्पन्न व बढ़ने वाले पौधे रोपना। नदी किनारे के किसानों को कम पानी की फसल लेने व टपक सिंचाई, स्प्रिंकल सिंचाई के लिए प्रेरित कर कम पानी वाली फसलों से बीज व सिंचाई उपकरण उपलब्ध कराएंगे।

शहर और ग्रामों में रैन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था के लिए निकायों व पंचायतों से नियम का पालन कराया जाएगा।

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