कीर्तन शब्द के साथ ईश्वर की संगीतमय भक्ति का स्वरूप मस्तिष्क में कौंधता है। लेकिन इससे अलग कीर्तन की एक अनूठी विधा है- नारदीय कीर्तन। जिससे केवल ईश्वर की आराधना ही नहीं देश भक्ति और समाजसेवा का संदेश भी दिया जा रहा है। कीर्तनकार अपने गीत-संगीत, नृत्य, अभिनय से श्रोता दर्शकों को भावभीने कथानक और संदेश बहुत ही सरलता से संप्रेषित कर देते हैं। भगवान नारद से शुरू हुई यह विधा पुणे की संस्था हरिकीर्तन सभा 136 साल से जीवित रखे हुए हैं और इसे देशभर में पहुंचाने का प्रयास भी कर रही है। यहां कीर्तनकारों की नई पीढिय़ां भी तैयार की जा रही है।
पुणे की हरिकीर्तन सभा में कभी विद्यार्थी रहे और अब शिक्षक की भूमिका निभा रहे रामचंद बुआ भिड़े और उनकी शिष्या सीमा बर्वे यहां क्षीरसागर स्थित महाराष्ट्र समाज धर्मशाला में दो दिनी नारदीय कीर्तन प्रस्तुति के लिए आए हैं। शनिवार शाम उन्होंने अपनी प्रस्तुति से लोगों को बांधे रखा। रविवार को भी उनकी प्रस्तुति होगी। रामचंद्र बुआ भिड़े बताते हैं संस्था 136 साल से नारदीय कीर्तन सिखा रही है। हजारों कीर्तनकार संस्था ने दिए हैं। भिड़े कहते हैं नारदीय कीर्तन को लेकर युवाओं में सीखने का उत्साह तो है लेकिन इसे बुजुर्गों के लिए ज्यादा जरूरी मानता हूं। अब हिंदी में भी प्रयोग किया जा रहा है। सीमा बर्वे के अनुसार दो साल पहले विश्वमंगल गो ग्राम यात्रा के रूप में देशी गायों के संरक्षण का अभियान चलाया था जिसमें कीर्तन के माध्यम से समाज को गो संरक्षण का संदेश देने की कोशिश हुई थी। कीर्तनकार स्वच्छता अभियान, बेटी बचाओ, नशा मुक्ति, शिक्षा आदि की जनजागृति के लिए भी कीर्तन में संदेश देते हैं।
उज्जैन में ये कीर्तनकार : उज्जैन में भी नारदीय कीर्तनकार मुकुंद गोखले, चित्रा पंडित और विवेक बनसोड़ हैं। इनके साथ हेमंत चरेगांवकर व जयंत कोरान्ने संगत करते हैं।
रामचंद्र भिड़े
सीमा बर्वे
दो भागों में होने से यह विधा ज्यादा लोकप्रिय
कीर्तनकार सीमा बर्वे के अनुसार नारदीय कीर्तन का पहला भाग पूर्व रंग कहा जाता है। जिसमें जिस तत्व पर कीर्तन होना है उसे समझाया जाता है। जैसे भक्ति पर कीर्तन होना है तो पहले भक्ति के बारे में समझाया जाता है और इसके बाद उत्तर रंग में भक्ति से ओतप्रोत कथानक आधारित कीर्तन होते हैं। कीर्तन के बीच कथानक को अभिनय, पद्य, विनोद, नृत्य, उपदेश आदि से भी प्रस्तुत किया जाता है। कई विधाओं को समेटे होने से नारदीय कीर्तन को शास्त्र भी कहा जाता है। कीर्तन में पारंपरिक वाद्य हरमोनियम, तबला, खड़ताल, झांझ का उपयोग संगत में किया जाता है। गायन शास्त्रीय रागों पर आधारित होता है।
देशभक्तों, क्रांतिकारियों के आख्यान भी
कीर्तन की विषय वस्तु में केवल ईश्वर की आराधना ही नहीं होती, देशभक्तों, क्रांतिकारियों के आख्यान भी प्रस्तुत किए जाते हैं। शिवाजी महाराज की वीरता की कथाएं, स्वामी विवेकानंद और अन्य संतों के जीवन चरित्र तथा देश के अन्य महापुरुषों की जीवन गाथा भी कीर्तन के साथ प्रस्तुत की जाती है। इसमें कई प्रयोग भी किए गए हैं। सिख समुदाय को नारदीय कीर्तन से जोड़ने के लिए फतेहसिंह व जोरावरसिंह की कथा का प्रस्तुतिकरण किया गया था, जिसे सिख समुदाय ने बहुत सराहा।
कीर्तन विशारद की उपाधि भी
हरिकीर्तन सभा द्वारा पारंगत होने पर विद्यार्थियों को कीर्तन विशारद की उपाधि दी जाती है। यह देश की नारदीय कीर्तन सिखाने वाली पहली संस्था है। संस्था प्रांगण में भगवान नारद का दुर्लभ मंदिर भी है। रामटेक स्थित कालिदास विद्यापीठ ने भी कीर्तन में बीए और एमए की उपाधि शुरू की है। शृंगेरी पीठ में शंकराचार्यजी ने भी सालाना कीर्तन सम्मेलन शुरू किया है।