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सरकार ने बनाई ऊंट पालन योजना, साल भर में एक पशुपालक को मिले तीन हजार

3 वर्ष पहले
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राज्य पशु की घटती संख्या को बढ़ाने को लेकर गत वर्ष 2017 जनवरी माह में शुरू हुई ऊष्ट्र विकास योजना विभाग की ओर से प्रचार प्रसार के अभाव में दम तोड रही है। पूरे साल उपखण्ड के पशुचिकित्सालय में योजना के तहत मात्र एक ऊंट पालक की आेर से आवेदन किया गया जिसकों योजना के तहत प्रथम किश्त भुगतान किया गया है।

विभाग के अधिकारियों ने बताया कि राज्य सरकार ने ऊंट पालकों को ऊंट के प्रजनन पर सहायता राशि देकर ऊंट पालन को बढ़ावा देने के मकसद से एक वर्ष पहले उष्ट्र विकास योजना शुरू की थी। जहां ऊंटनी के ब्याने पर पैदा हुए बच्चे पर 10 हजार रुपए की आर्थिक सहायता पशुपालक को दी जानी है। योजना के तहत लाभान्वित पशुपालकों को तीन किश्तों में योजना का लाभ प्राप्त होगा। जिसमें प्रथम व द्वितीय तीन हजार रुपए व तीसरी किश्त में शेष चार हजार रुपए का लाभ दिया जाएगा। पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस योजना लागू करने का मुख्य उद्देश्य ऊंट पालन को बढ़ावा देने के साथ ही ऊंटों की संख्या में बढ़ोत्तरी करना भी है। इसके लिए ऊंट पालक का पशु चिकित्सालय से पंजीयन करवाना आवश्यक होगा। लेकिन उपखण्ड में ऊंटपालन के प्रति पशुपालकों के कम रुझान होने के साथ ही योजना का प्रचार प्रसार नहीं होने से इस योजना का लाभ ऊंटपालकों को नहीं मिल पा रहा है। इसी का नतीजा है कि उपखण्ड में अब तक मात्र एक ऊंटपालक की ओर से इस योजना का लाभ प्राप्त हो रहा है।

इनका कहना है

ऊंट पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य को लेकर मुख्यालय की ओर से उष्ट्र विकास योजना शुरू की है। जहां योजना को शुरू हुए एक वर्ष होने वाला है। लेकिन इस योजना के तहत अब तक मात्र एक आवेदन ही आया है। जिसे योजना का लाभ दिया जा रहा है। याेजना को सफल बनाने के लिए समय समय पर ऊंट पालन करने वाले पशुपालकों को योजना की जानकारी देने का कार्य किया जाता है। डॉ.जावेद हुसैन,वरिष्ठ पशुचिकित्सक, पशु चिकित्सालय,ब्यावर

उपखण्ड में 93 ऊंट

चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि उपखण्ड में ऊंटपालन के प्रति पशुपालकों का रुझान कम है। उपखंड में ऊंटों की संख्या मात्र 93 है। इसमें ग्राम पुनेरा में 20, ग्राम काबरा में 50,बिहार रतनपुरा में 11, ग्राम सोनियाना में 07, ग्राम रुढ़ाणा में 04 व ग्राम कुण्डाल में मात्र 01 ऊंट ही है। हालत यह है कि ब्यावर उपखंड में ऊंटों की अच्छी तादाद होने के कारण जिस गांव को ऊंटो का बाडिया कहा जाता है वहां अब एक भी ऊंट नहीं है। उपखण्ड में करीब तीन सौ से अधिक गांव हैं लेकिन ऊंट पालन केवल छह गांवों मे ही किया जा रहा है।

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