मन से ही राम- रावण बना जाता है: पं. मानवता
विदिशा| रावण का तन भी बड़ा आैर मकान भी बड़ा था।परंतु मन बहुत छोटा था। उसके मन में न अपने भाई विभीषण के लिए जगह थी, न ही बहन शूर्पणखा के लिए। दोनों को अपने से अलग कर दिया। जबकि रामजी का मन इतना बड़ा था कि उसमें शबरी, जटायु, केवट और सुग्रीव भी समा गए। इतना ही नहीं रामजी का मन तो इतना बड़ा था कि उसमें दुश्मन का भाई विभीषण भी समा गया। जिसका मन बड़ा वह राम है, जिसका मन छोटा वह रावण है। उक्ताशय के उद् गार मानस मर्मज्ञ पं. श्याम मानवता ने गिरधर गार्डन में रामकथा के तीसरे दिन व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि 84 लाख योनियों में मन बड़ा करने की सुविधा केवल मनुष्य के पास है। पंडितजी ने कहा कि भगवान शंकर पार्वतीजी को श्रीमती नहीं सुमति कहते हैं। वे कहते हैं कि साब सुनु सुमति भवानी। अर्थात किसी के जीवन में श्रीमती का होना सरल है परंतु श्रीमती सुमति हो तो ही रामकथा हो सकती है ।