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राहुल गांधी के सामने नेतृत्व की तीन बड़ी चुनौतियां

कांग्रेस में जमीनी नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है। ऐसे में राहुल को संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करने की जरूरत है।

Bhaskar News | Last Modified - May 12, 2018, 12:59 AM IST

राहुल गांधी ऐसे समय में प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं, जब कांग्रेस का पतझड़ काल चल रहा है। ऐसे में कांग्रेस का 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुमत में आना फिलहाल संभव नहीं दिखता। अगर राहुल गांधी की पार्टी आम चुनावों में सबसे बड़े दल के रूप में भी उभरना चाहती है तो भी उन्हें पहाड़-सी चुनौतियों से पार पाना होगा।
सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि सोशल मीडिया के दौर में कांग्रेस की भ्रष्टाचार, वंशवाद, हिंदू-विरोधी नकारात्मक छवि को बदलने की है। दूसरी चुनौती प्रधानमंत्री मोदी के कद का करिश्माई नेता का न होना है। हालांकि राहुल के नेतृत्व में भद्रता, विनम्रता और संवेदना तो झलकती है, लेकिन नज़रिये की व्यापकता नहीं। ऐसे में राहुल गांधी देश का नेतृत्व करने की सोच रहे हैं तो उन्हें देश को आगे बढ़ाने का एक अलग और स्पष्ट खाका पेश करना होगा। उन्हें यह रोडमैप बताना होगा कि अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो बढ़ती बेरोजगारी, किसान आत्महत्या, आर्थिक विषमता, विनिर्माण तथा पर्यावरण क्षेत्र की राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान कैसे निकालेंगे? इतना ही नहीं, मोदी सरकार से युवाओं सहित जिन वर्गों का मोहभंग हो रहा है उन्हें राहुल गांधी किस तरह आकर्षित कर अवसर को भुना पाते है? यह उनके नेतृत्व की असली परीक्षा होगी।
राहुल के सामने तीसरी बड़ी चुनौती पार्टी संगठन में नई जान फूंकने की भी है। पार्टी में जड़ता आ गई है। न तो कांग्रेस कार्यसमिति के नियमित चुनाव हो रहे हैं, न ही निचले स्तर पर ऐसा कुछ देखा जा रहा है। पार्टी के पास केंद्रीय नेतृत्व तो है पर जमीनी नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है। ऐसे में राहुल गांधी को संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करने की जरूरत है। साथ ही जमीनी नेताओं और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद बनाने के तरीके खोजने होंगे ताकि लगातार मिल रही चुनावी हार से हताश जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल लौटाया जा सके। इसके अलावा वक्त की नब्ज़ को पहचानते हुए अब पार्टी में पुराने,अनुभवी तथा नई प्रतिभाओं के बीच संतुलन बनाने पर भी ध्यान देना होगा।

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