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सांसत में सांस

6 वर्ष पहले
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अगर सुनें कि किसी को अस्थमा हो गया है, यानी दमे का रोग, तो अमूमन ऐसी प्रतिक्रिया होती है, मानो जान पर घात आ पड़ी हो!
हां, यह मुश्किल हालात की ओर इशारा करता है, लेकिन इसे सम्भाला जा सकता है।
दमा है क्या?

इसे समझने के लिए फेफड़ों की बनावट को समझना होगा। हम पेड़ को उल्टा खड़ा करने की कल्पना करें, यानी जड़ें ऊपर की ओर। अब पेड़ के तने को सांस की वह मुख्य नली, यानी विंड पाइप मानें जो गले से उतरकर फेफड़ों तक जाती है। यह मोटे कार्टिलेज की बनी होती है, सो सिकुड़ती नहीं। इस तने से जुड़ी हैं पेड़ की छोटी-बड़ी शाखाएं। ये हैं श्वास नलिकाएं, जिनकी दीवारें पतले कार्टिलेज की बनी होती हैं, इसीलिए सिकुड़ती हैं।

इन नलिकाओं में हुए इन्फेक्शन के नतीजतन सूजन और सिकुड़न आती है, जो सांस अवरुद्ध करने लगती है। फेफड़ों तक साफ़ हवा पहुंचाने वाली नलिकाएं पतली हो जाएंगी, तो दम फूलेगा और इंसान सांस लेने की कोशिश में तड़पने लगेगा। यही है दमा, यानी अस्थमा।

इसे ब्रॉन्काइटिस क्यों कह दिया जाता है?

ब्रॉन्काइिटस तीन तरह का होता है। चंद दिनों के फ्लू के कारण होने वाली खांसी जैसी ब्रॉन्काइटिस को एक्यूट ब्रॉन्काइटिस कहते हैं। तीसरी होती है क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस, जो सिगरेट आदि के पीने की वजह से सांस की नली में सिकुड़न के कारण होती है। दूसरी और सबसे महत्व की बन गई है एलर्जिक ब्रॉन्काइटिस, जिसका ज़िक्र हम यहां कर रहे हैं, क्योंकि यही है अस्थमा के नाम से कुख्यात। जिन लोगों को दमे के नाम से ही डर लगता है, उनके लिए इसका दूसरा नाम ही सच मान बैठना, दिल की तसल्ली के लिए तो ठीक है, लेकिन रोग को क़ाबू में रखने के लिए उपाय दमे वाले ही अपनाने होंगे।

कैसे होता है दमा?

बार-बार किसी ख़ास एलर्जन (एलर्जी का कारक) के सम्पर्क में आने पर खांसी, छींकंे या नाक से पानी आने को लम्बे समय पर नज़रअंदाज़ करना इसका आधार बनता है। एलर्जन की वजह से सांस की नलियां सूजने लगती हैं, सिकुड़ती हैं और बाद में उनकी भीतरी दीवारें लाल हो जाती हैं, उन पर बलगम जमने सेे खांसी उत्पन्न होने लगती है। यही है इनफ्लेमेशन।

क्यों होता है दमा?

एक कारण तो आनुवंशिक है। यानी परिवार में कभी किसी को रहा हो, तो हो सकता है। दूसरा वही है, वातावरण में मौजूद एलर्जी के ट्रिगर्स। अब अगर कोई एलर्जन को सहन न कर पाने वाली प्रतिरोधक क्षमता रखता हो, तो उस पर असर साफ़ और जल्दी होता है। लम्बे समय तक जिनकी खांसी ठीक न होती हो, ज़ुकाम जल्दी होता हो, धूल, धुएं, ख़ास स्प्रे जैसे डियो, परफ्यूम आदि से छींकें आती हों, उन लोगों को ख़ासतौर पर इस ओर ध्यान देना चाहिए।

लक्षण कैसे पहचानें

सदा कफ़ बना रहे, सफ़ेद गाढ़ा बलगम आता हो, सांस लेने पर घर्र-घर्र की आवाज़ तथा सीने पर किसी ने कसकर कपड़ा बांध दिया हो, ऐसा अहसास दमे के मुख्य लक्षणों में से हैं।

दौरा किसे कहते हैं और क्यों?

अगर अचानक आपके आस-पास की हवा में से ऑक्सीजन घटा दें, तो आपका दम घुटने लगेगा न, वही हाल होता है दमे के मरीज़ का। उसके फेफड़ों में हवा का रास्ता रुक जाता है। सांस फूलेगी, दम घुटेगा। लेकिन इससे आगे यह होता है कि मरीज़ के रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है। मरीज़ लगभग तड़पने लगता है। ऐसे में केवल ऑक्सीजन देने से काम नहीं चलता। कई बार मामला आईसीयू में ले जाने जितना गम्भीर हो जाता है।
उपचार असल में प्रबंधन होता है

दमे को जड़ से ख़त्म करना मुमकिन नहीं। इसको नियंत्रण में रखा जा सकता है, वह भी लम्बे समय तक और आसानी से। दवाइयों को सही समय पर लें और ट्रिगर्स से बचकर रहें। दवाएं दो तरह की हैं, - रिलीफ और दूसरी एंटी इनफ्लेमेशन दवाएं। ये दोनों पम्प (पफ) के सहारे बेहतर काम करती हैं। रिलीफ, जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, राहत देने वाली दवा है। अगर किसी एलर्जन के माहौल में जाने से खांसी आने लगे, तो रिलीवर पम्प के 8 पफ्स ले लीिजए। इसका इस्तेमाल हफ़्ते में दो-तीन बार कर सकते हैं। तीन बार से ज़्यादा कर रहे हों, तो मान लीजिए कि सांस की नली में सूजन बढ़ रही है और अब रिलीवर कारगर नहीं होगा।

अब बारी आती है एंटी इनफ्लेमेशन दवाओं की। एलोपैथी में सबसे कारगर और शक्तिशाली दवाएं हैं स्टेरॉइड्स। दमे का उपचार इनसे सबसे अच्छी तरह से होता है, लेकिन ढेर सारी शंकाएं भी रही हैं कि इनके साइड इफेक्ट्स ख़तरनाक होते हैं। पिछले 20-25 सालों में हालात बदले हैं। अब इनकी मात्रा का चालीस गुना से भी कम इनहेलर में डालकर लिया जाना दमे का कारगर प्रबंधन करता है। दवाओं का इतना कम डोज़ छोटे बच्चों के साथ-साथ गर्भवती स्त्रियों तक के लिए पूरी तरह सुरक्षित पाया गया है।

ट्रिगर्स कैसे और कितने?

ठंडी हवा (एसी की), बर्फ़ीली हवा, धूल (कारपेट या सामान पर जमी तक), घनी हरियाली, स्प्रे (इनमें मौजूद एअरोसॉल्स), इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों में काम करने वाले, बेकरी या कारपेंटरी करने वाले सभी, जो लम्बे समय तक ऐसे ट्रिगर्स के सम्पर्क में हो सकते हैं, जो एलर्जन हों, दमे के ख़तरे में आ सकते हैं।

सावधान हो जाएं!

सांस उखड़ना, चलने, सीढ़ी चढ़ने पर सांस का फूलना, बोलने पर थकान महसूस करना- ऐसे तमाम लक्षण जहां स्टैमिना की कमी, दिल के रोग आदि के हो सकते हैं, वैसे ही ये दमे के सूचक भी हो सकते हैं। असामान्य छींकें, सतत खांसी, सांस फूलना और सीने में कसावट को गम्भीरता से लें। दमा केवल मैनेज किया, यानी सम्भाला ही जा सकता है। जो सही चिकित्सकीय सलाह पर चलते हैं, उन्हें इसे मैनेज करने में ज़रा भी कठिनाई महसूस नहीं होती।
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