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महाभारत 2019: बीच धार में ही पसर गई पीडीपी की भैंस- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला

महाभारत 2019 के तहत ख्यात कवि कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली श्रृंखला।

Danik Bhaskar | Jun 25, 2018, 01:43 PM IST
मशहूर कवि डॉ. कुमार विश्वास। मशहूर कवि डॉ. कुमार विश्वास।

बात करते हुए हाजी पंडित उचककर बार-बार हाथ पीठ पर ले जाते थे। पूछा, "क्या हुआ हाजी? ऐसे क्यों उचक रहे हो?" बोले, "क्या बताऊं महाकवि! पीठ के ऐसे हिस्से में खुजली हो रही है जहां हाथ नहीं पहुंच रहा। ये जगह कतई कश्मीर हुई पड़ी है।" मैंने कुरेदा, "कश्मीर? तो जब हाथ ठीक से नहीं पहुंचा तो टांग खींच ली?" हाजी आत्मविश्वास से लदे बैठे थे, "ये तो होना ही था महाकवि! नदी पार करने की गरज से भाई लोग जिस पीडीपी की भैंस पर बैठकर उसे पनडुब्बी साबित करने में जुटे थे, वो ससुरी बीच धार में ही पसर गई। दुख तो इस बात का है, कि किन्नर जन्मोत्सव से पहले बख्शीश ले गए और सत्ता की बहुरिया बांझ निकल गई।"

मैंने कहा, "वॉट्सएेप पर बिरयानी में पत्थर निकलने वाला जोक बहुत घूम रहा है! मामला आख़िर है क्या?" हाजी ने जवाब में ऐसे बयान किया जैसे उस पार्टी में वो भी रहे हों, "हुआ यूं कि बिरयानी खाते-खाते साहेब को अचानक याद आया कि वो तो परम वेजिटेरियन हैं। हड़बड़ाते उठे और राममाधव-राममाधव जपते-जपते बोले कि डोभाल-कृपा ने बचा लिया कि बस चावल-चावल ही खाया था। हालांकि बाद में दांतों में तिनका नचाते भी देखे गए।"


फिर परमात्मा से बात करने की मुद्रा में बोले, "दरअसल ये साझा चूल्हा पहले दिन से ही कच्ची ईंटों से जोड़ा गया था। साहिबा जब दाईं आंख में गठबंधन का सुरमा घाल रहीं थीं, तभी बांयी आंख चुगली खा रही थी, कि ये केसरिया दूध के कुल्ले एक दिन कच्ची घानी के बफ़ारे न करा दे। और देखो महाकवि, वही हुआ! केसर की क्यारी में महबूबा की बिंदी क्या लगी, उन्नीस की संभावनाओं में प्रारंभिक कैंसर हो ही गया।" मैंने भी जुमला जोड़ने की कोशिश की, "तो हाजी यानी महबूबा तो न घर की रहीं न घाटी की।"


हाजी ने उस्तादी जुमला जोड़ा, "अरे अपने अमित भाई ने घाट-घाट का पानी पीया है, तो ये घाटी कहां टिकती है? मोटा भाई ने जो चाह लिया वो कर ही दिया समझो। और मज़ा देखो महाकवि, इस सब से राजनाथ जी उस लड़की के अंजाने फूफा की तरह छोड़ दिए गए जैसे लड़की मुंबई में ही ब्याही और वहीं से तलाक़ लेकर ज्यों की त्यों गांव लौट जाए, और बिचारे फूफा जी को कुछ पता ही न चले!" मुझे हाजी पंडित से कुछ और एक्सपर्ट कमेंट की उम्मीद जगी, "लेकिन ये सब किया क्यों?"

हाजी ख़ुद को एक्सपर्ट कहलाने में एक प्रतिशत का भी संशय नहीं रहने देना चाहते थे, सो छूटते ही बोले, "सब उन्नीस की तैयारी है महाकवि। उन्नीस में जरा-सा भी ‘उन्नीस-बीस’ न हो जाए, इसलिए कर्नाटक का जला कश्मीर भी फूंक-फूंक कर पी रहा है। और ये ज़रूरी भी है, क्योंकि कश्मीर दुनिया की इकलौती जगह है, जिसके नाम पर दो-दो देशों में चुनाव लड़े जाते हैं, दुकानें चलाई जाती हैं! यहां भी यही होगा। पटरी पर बुलेट तो चली नहीं, अब इस बात पर सीना ज़रूर ठोकते फिरेंगे कि बुलेट रोकने के लिए हमने चलती सरकार भी पटरी से उतार दी!"


मैंने कहा, "जो भी हो हाजी, लेकिन सोनम गुप्ता के बाद की ये सबसे चर्चनीय बेवफ़ाई रही। उसकी तो नोटों पर ही बेवफाई थी, ये तो वोटों के लिए की गई बेवफाई है और मुझे लगता है कि ये भी नोटा से डर कर की गई है!" हाजी बोले, "अमां तुम जो भी कहो महाकवि! वो तो आजकल यही कहते फिर रहे हैं -
नज़र में खीर कुर्सी की
न उन्नीस की मलाई है !
हम ही ने तब बनाई थी
हम ही ने अब गिराई है..!"