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महाभारत 2019: खेल-तमाशा सब कुछ तय है, ये सब नूरा कुश्ती है- कुमार विश्वास की व्यंग्यात्मक श्रृंखला

महाभारत 2019 के तहत ख्यात कवि कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली श्रृंखला।

Dainik Bhaskar

Jul 08, 2018, 11:51 PM IST
डॉ. कुमार विश्वास डॉ. कुमार विश्वास

कल शाम टहलते-टहलते हाजी के घर अचानक पहुंचा तो देखा ड्राइंग रूम में कन्वर्टिबल बेड-कम-सोफे पर उकड़ूं बैठे कार्टून नेटवर्क देख रहे थे। मैंने मज़े लिए, "हाजी, कई राज्यों में मानसून सत्र चल रहे हैं। फीफा फूं-फां किए हैं, वही देख लेते किसी न्यूज़ चैनल पर।" हाजी ने बिना टीवी से नज़र हटाए कहा, "अमां महाकवि! क्या देखूं वहां? शाम होते ही ज़िल्ले इलाही तीतर लड़ाने लगते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे बुद्धि का दरवाज़ा बंद कर छोटी-छोटी खिड़कियां खोल ली हों और उनमें से मुंह निकालकर तीतर चोंच लड़ा रहे हों।" मैंने बैठते हुए कहा, "हाजी, हम तुम्हें करते हैं, थोड़ा कुछ तो तुम भी बर्दाश्त करो।"

हाजी बोले, "बर्दाश्त? वो तो अच्छा है कि हिरण बोल नहीं पाते वरना सलमान ख़ान वाले मामले में तो हर चैनल पर एक-एक हिरण बैठा नज़र आता।" फिर खीझ कर बोले, "थोड़ी देर में तो न्यूज़ रूम से तबले की थाप और घुंघरुओं की आवाज आने लगती है और ऐसा लगने लगता है कि चौथे स्तंभ का ‘चौथा’ करने का आयोजन चल रहा हो!" मैंने बात आगे बढ़ाई, "ये बहस में आने वाले प्रवक्ता भी कमाल होते हैं हाजी! जगदीश राज जी के ‘यू आर अंडर अरेस्ट’ की तरह एक निश्चित टाइम पर रटे-रटाए निश्चित डायलॉग ले कर पहुंच जाते हैं।" हाजी सीधे होकर बैठते हुए बोले, "अमां महाकवि! टीवी की बहस का तो क्या कहिये, इधर किसी ने भैंस के आगे बीन बजाकर सवाल दाग़ा नहीं कि उधर से बीन के आगे भैंस बजाकर जवाब आया नहीं! सैनिक सर्जिकल स्ट्राइक करके वापस शिविर में आ गए पर ये चैनलिया प‌ट्‌ठे अभी तक पख्तून में ही डेरा जमाऐ हुए हैं।"

हाजी को संजीदा होता देख मैंने चिकोटी काटी, "ऐसा न बोलो हाजी! इन चैनलों की वजह से ही बगदादी का एक सिर दस-दस बार भारत आ चुका है। तुम एहसान मानने की बजाए बेचारों को गरिया रहे हो!" हाजी बोले, "मज़े न लो महाकवि! कभी-कभी तो मन में आता है कि दूरदर्शन पर गोबर से खाद बनाने की विधि ही सीख लूं। वैसे भी फ़िल्म से लेकर सियासत तक पूरे देश में गोबर से खाद बनाने की ही तो कोशिश हो रही है। क्या पता ऐसे ही फ़स्ल-ए-बहार आ जाए।"

हाजी अचानक दूसरी पटरी पर चल दिए, "यार महाकवि! एक बात बताओ, तुम तो चैनलों पर जाते रहे हो। ये एंकर लोग चीखने-चिल्लाने के साथ-साथ पढ़ने-लिखने पर ज़रा वक्त नहीं देते क्या?" मैंने अपना अनुभव बघारा, "बेचारे क्या करें, जब तक पुराना मेकअप उतारकर नई पुताई होती है, तब तक अगली बुलेटिन का समय आ जाता है। और बुलेटिन का समय भी न हो तो कोई न कोई बवाली नेता ब्रेकिंग न्यूज़ का मसाला दे ही देता है।"
हाजी ने लट्‌ठ मारा, "अपने परम बवाली यार को याद करने का कोई मौका नहीं छोड़ते महाकवि! ख़ैर, चैनलों की बात चली तो ये सुनो -

महंगा चैनल , महंगा एंकर सिर्फ ख़बर ही सस्ती है ,
खेल-तमाशा सब कुछ तय है, ये सब नूरा कुश्ती है
चैनल क्या हैं सच पूछो तो लफ़्ज़ों की नौटंकी है ,
खबरों की इस नौटंकी में सच की हालत पस्ती है!"

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