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महाभारत 2019: गठबंधन के लिए पत्थर की रस्सियों में गांठ कैसे लगेगी?- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला

ख्यात कवि कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली श्रृंखला

Bhaskar News | Last Modified - Aug 13, 2018, 07:24 AM IST

महाभारत 2019: गठबंधन के लिए पत्थर की रस्सियों में गांठ कैसे लगेगी?- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला

छोटे-छोटे तिरंगों का पैकेट हाथ में लिए मेरे बेडरूम के राजपथ पर घुसपैठ करते हाजी बोले, ‘मुबारकबाद दो आज़ादी की हमें महाकवि !’ मैंने भी अपना अधिकार जताया, ‘तो तुम भी हमें मुबारकबाद दो!’ हाजी ने छेड़ा, ‘शादी-शुदा आदमी को काहे की मुबारकबाद?’ मैंने भी बॉल वापस की, ‘अब खट्‌टे अंगूर वाली मत करो हाजी! तुम्हारी नहीं हुई तो शादी को ही बुरा बता दिया?’
हाजी अपनी पसंदीदा नाव पर सवार हो गया, ‘तुम भी तो बारात लेकर गए थे कांग्रेस के दरवाज़े पर। जब गेटकीपर ने उपसभापति इलेक्शन में बाहर से ही धकिया दिया तो अब कहते हो, अकेले चुनाव लड़ेंगे जी। ये न हुई खट्‌टे अंगूर वाली?’
फिर पास आकर बोले, ‘वैसे सुना है अंगूर का पानी भी ख़ूब बहा है बेंगलुरू में! तुम काहे के शायर हो जी? सरकार की चाय नहीं पी और वो सरकार-सरोकार दोनों को बेशर्मी के सोडे में घोलकर पी गया! कमाल है भई तुम्हारे यहां भी! बेंगलुरू में अंगूर का पानी फैल रहा है, और पंजाब में रायता। लेकिन, बुरा मत मानना महाकवि! तुम्हारे यार को बस फैलाना-चिल्लाना-बहाना आता है, समेटना कुछ नहीं आता।’ मैंने आशंका जाहिर की, ‘मुझे तो पूरा गठबंधन ही फैलता दिख रहा है। इस अश्वमेध में सबके अपने-अपने घोड़े हैं और सब अलग-अलग दिशा को मुंह किए हुए हैं। मुझे लगता है हाजी कि तुम्हारी ही तरह इनकी भी दुल्हन ऐन वक़्त पर खिड़की से अमित भाई का इशारा पाते ही ‘आज़ादी-आज़ादी’ चिल्लाते हुए भाग निकलेगी।’
हाजी ने बात पर एक और गांठ लगाई, ‘हालात तो ऐसे ही हैं महाकवि! कोई भी लचीला होना नहीं चाहता। पत्थर की रस्सियों में गांठ कैसे लगेगी? आज़ादी सबको प्यारी होती है लेकिन, दही की हांडी फोड़ने के लिए भरोसे भरी बांहों को गूंथकर सीढ़ी तो बनानी पड़ती है।’ मैंने कहा, ‘सियासत क्या, अब तो समाज में भी यही हाल है। अभी पिछले संडे को सामने वाले वर्माजी ने घर पर राम-कथा रखी। मैंने पूछा कि भाई जी क्या अवसर है, तो बोले कि बड़े भाई से ज़मीन का झगड़ा चल रहा था। आख़िर कोर्ट ने मेरे हक़ में फैसला दिया। एक बड़े झंझट से आज़ादी मिली! अब बताओ हाजी, एक भाई के लिए अयोध्या के सिंहासन को ठुकराने वाले की कथा भाई को ठुकरा सुनी जा रही है! गलती किसी की भी हो, रिश्ते तो मारे जा रहे हैं ना? आज़ादी के नाम पर दरअसल अब तो रिश्तों, संवेदनाओं और कानूनी दायरों तक से आज़ादी की तलाश हो रही है।’ हाजी समाचारों से अपडेट रहते हैं, बोले, ‘आज़ादी मांगने का भी अपना-अपना लेवल है महाकवि! कोई चिट्‌ठी लिखकर मांग रहा है, कोई पत्थर फेंककर और कई चिंटूछाप आज़ादी के परिंदे तो ‘किकी’ के पंख लगाकर ही भगत सिंह होने की कोशिश कर रहे हैं!’ मैंने कहा, ‘वैसे 2019 भी किसी के लिए किकी चैलेंज से कम ख़तरनाक नहीं है। भाजपा वाली कार का दरवाज़ा खोलकर अमितभाई कई जगह जम्प लगा चुके हैं। कश्मीर में फिसल गए और कर्नाटक में टांग तुड़वाली।’

हाजी बोले, ‘पहले पहल तो मुझे भी समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हो गया। फिर पता चला कि अमितभाई ड्राईव भी ख़ुद ही कर रहे थे और जम्प भी ख़ुद ही मार रहे थे। अब की बार दरवाज़ा बंगाल में खुला है। देखते हैं क्या होता है।’ फिर रुककर बोले, ‘यार महाकवि! एक बात कुछ अजीब नहीं है, उधर कश्मीर में भाई लोग आज़ादी आज़ादी का हल्ला कूट रहे हैं, और इधर बंगाल से कइयों को आज़ादी दी जा रही है, तो ये आज़ाद नहीं होना चाह रहे!’ मैंने कहा, ‘हाजी, जानते तो तुम भी हो कि ये सारी आज़ादी का हल्ला ख़ुद ही सियासी हलकों का ग़ुलाम है। हाजी बोले जाने दो महाकवि, पुरखों की दी हुई आज़ादी जीओ, इन आज़ाद ग़ुलामों की ग़ुलामी छोड़ो, शेर सुनो
‘कहने को तो आज़ाद हरेक ख़ास ओ आम है ,
बस रहनुमा आज़ाद हैं, हम सब ग़ुलाम हैं !’

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