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महाभारत 2019: चुनावी तीर्थ के घाट-घाट पर मंडराते वोटों के मौसमी पंडे- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला

कवि कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली श्रृंखला

Dainik Bhaskar

Sep 10, 2018, 08:13 AM IST
कुमार विश्वास कुमार विश्वास

दरवाज़े के सामने से जल्दबाज़ी में मुंह चुराकर निकल रहे हाज़ी को मैंने दरेरा ‘अमां हाज़ी तुमने तो बताया तक नहीं कि सुरजेवालाजी द्वारा जनेऊ संस्कार कराने वाले अकस्मात हिन्दू-हिन्दू दिख रहे राहुल बाबा की मानसरोवर यात्रा तुम्हारी एजेंसी ने ही सेट की थी!’ कुढ़े हुए हाजी ने बिना मुंह फेरे झल्लाए स्वर में कहा ‘क्यूं’? जब इतने बड़े देश का महाव्यस्त प्रधानमंत्री तीन घंटे जापान के प्रधानमंत्री से क्योटो में कन्वर्ट बनारस के घाट पर आरती की टुनटुनी बजवा सकता है तो हमारा निपट खाली युवराज तीन दिन के लिए शंकर से वर मांगने मानसरोवर नहीं जा सकता?’ मैंने कहा ‘बिल्कुल जा सकता है, पर वर क्यूं’? वधू मंगवाओ उससे, सोनियाजी की तबियत भी ठीक नहीं रहती, ज़रा घर ही संभल जाएगा’।

हाजी बोले ‘एक ही बात है, और अब तो सुप्रीम-कानून भी आ गया है, वर मांगो या वधू दोनों जायज़ हैं! बहू या बहुमत कुछ भी दे दें, बस अब शंकर कुछ दे दें।’ मैंने हाज़ी का पुराना गिला, गीला किया ‘शंकर तो तुम्हारे युवराज को गुजरात में ही मणि दे रहे थे वो तो मणिशंकर ने हाथ से गिरवा दी, खैर अब राजस्थान, छत्तीसगढ़ में शायद इस वसुंधरा का कोई रमन-चमन हाथ लगे तुम्हारे युवा-जोश को’। हाज़ी बोले ‘देखो पंडित, लग तो रहा है, बेचारा घाट-घाट घूम तो रहा है, पर ये बेचारा बालक भी क्या करे’? पाला भी तो ऐसों से पड़ा है जो घाट-घाट का पानी पिए बैठे हैं!’ मैंने हाज़ी के हाथ में चाय का कप थमाकर उन्हें टिकने का टोकन पकड़ाते हुए कहा ‘पर हाज़ी ये नेता लोग चुनाव आते ही, तीर्थ-मंदिर-मज़ार पर क्यूं मंडराने लगते हैं?’ पहला घूंट अंदर लेकर हाज़ी ने पहली सूक्ति छोड़ी ‘जिन मतदाताओं को भगवान भरोसे छोड़कर साढ़े चार साल मौज़ कूटी है उन्हें भगवान के द्वार से दोबारा वोट में बदलकर वापस लेने जाते है महाकवि!’ मैंने बात फिर वहीं खींची ‘पर हाज़ी इन नेताओं को इतनी अव्वल स्तरहीनता के बाद भगवान के घर में जाते वक़्त ज़रा भी डर नहीं लगता होगा? हमारा चचा ग़ालिब तो यही सोच-सोचकर घुल गया ‘क़ाबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब’!

हाज़ी बोले ‘अमां महाकवि, तुम हर वक़्त सेंटियाये काहे रहते हो? लाज-शर्म-वादा-दोस्ती-उसूल, ये सब तुम जैसे शायर-मिज़ाज़ आदमी के लिए गहने होंगे, इन सियासत दानों के लिए ये सब, बस हर बार नए यूज़ में आने वाले आइटम भर हैं, जिन्हें यूज़ करो और फेंको। मैंने कहा ‘वो तो है हाज़ी पर ऐसे तो हर बार इस मुल्क़ की उम्मीद अधूरी ही रह जाएगी? कुछ नहीं होगा इन खानदानी-काबिज़ और नवपतित उम्मीद-हत्यारों का?’ हाज़ी ने चाय का आख़िरी घूंट सुड़कते हुए ज्ञान फ़ैलाया ‘महाकवि इन्हें कुछ नहीं होगा का इनका भ्रम ही इन्हें डुबो देगा!

भगवान-अल्लाह भी हंसता होगा जब इन्हें ज़माने भर का खून चूसकर अपने दरवाज़े पर वोटरों का चरणामृत चखते देखता होगा, कि पट्ठो कर कुछ भी लो, इस बार जनता तुम्हारे सारे बही-खाते तुम्हारे चाय के लिए मीथेन निकलने वाले नालों में बहाकर तुम्हारे कूड़े के ढेर में तब्दील मुहल्ला अस्पताल में तुम्हें ही जमा कराएगी! जनार्दन को पता है कि जनता को सब पता है, बस वो सही वक़्त का इंतज़ार करती है, जैसे योगेश्वर कृष्ण ने शिशुपाल की सौवीं गाली का किया था! चलता हूं एक नेताजी की तीर्थयात्रा सेट करनी है तब तुम जमनाप्रसाद उपाध्याय का मुक्तक सुनो, महाकवि यूं ही हिंदी-हिंदुस्तान के काम में जुटे रहो-

नदी के घाट पर भी अगर सियासी लोग बस जाए,
तो प्यासे होंठ एक-एक बूंद पानी को तरस जाए।
गनीमत है कि मौसम पर हुकूमत चल नहीं सकती,
नहीं तो सारे बादल इनके खेतों में बरस जाए....’

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कुमार विश्वासकुमार विश्वास
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