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महाभारत 2019: उसूलों के बाद बिकने के लिए आत्मा अंतिम सामान है- कुमार विश्वास की व्यंग्यात्मक श्रृंखला की दूसरी प्रस्तुति

महाभारत 2019 के तहत ख्यात कवि कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली श्रृंखला।

Danik Bhaskar | May 28, 2018, 07:49 AM IST
ख्यात कवि कुमार विश्वास। ख्यात कवि कुमार विश्वास।

कवि-सम्मेलन से लौटकर वैसे ही देर से सोया था कि सुबह ही सुबह हाजी पंडित के हो-हल्ले में उठ बैठा। आंगन में खड़े ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे ‘भाइयों, बहनों, आइए-आइए, मिलिए लोकतंत्र के सबसे शर्मदार, निष्ठावान प्राणी से। ‘नींद के झोंके में गिरता-पड़ता अपने बेडरूम की रेलिंग से आंगन में झांका तो अजीब नज़ारा था।


हाजी पंडित एक मरा गिरगिट लटकाए घर भर को आंगन में इकट्‌ठा किए हुए थे। मैंने झुंझला कर कहा, ‘अमां हाजी भाई, सुबह-सुबह ये क्या बचपने वाली हरकत है? इस बेचारे जानवर को क्यों मार डाला?’ वो गुर्राए, ‘देखो महाकवि! इल्ज़ाम न लगाओ। हम-तुम लंगोटिया यार हैं। जब तुम राजनीति में जाकर आज तक आत्मा भी न मार पाए तो हम भला इस गरीब को कैसे मारते? अरे पूरी दुनिया में पल-पल रंग बदलने में माहिर इन रंग-बदलू गिरगिट जी ने तो आत्महत्या की है।’


मैं झुंझलाया, ‘क्यों ठिठोली कर रहे हो हाजी? भला जानवर भी कभी आत्महत्या करते हैं? और करेगा भी किसलिए?’
आंख की कोर पर ‘शिकार फंस गया है’ वाली शातिर मुस्कान सहेज हाजी पंडित बोले, ‘हां, अब तुम सही रास्ते पर हो महाकवि! दरअसल पिछले कुछ दिनों तक बेचारा यही रंग-बदलू के नाम से कुख्यात था। पर अब, जब राजनैतिक रंग बदलने में इसे लखनऊ के कुछ नरेशों और दिल्ली के कुछ मालिकों ने पछाड़ दिया तो भला प्राणी ग्लानि में आत्महत्या कर बैठा।’


मैंने अपने अज्ञान को समेटकर सीढ़ियां उतरते-उतरते पूछा, ‘हाजी, सियासत में रंगों का क्या काम? हां, दंगा करवाना हो तो ज़रूर हमारे नेता माहौल को हरा-भगवा बनाते रहते हैं।’
उन्होंने मृत गिरगिट को राजकीय सम्मान के साथ कोने में पड़े जूते के खाली डब्बे में लिटा दिया और सामने पड़े मूंड़े पर पसरते हुए बोले, ‘देखो महाकवि! जीव-जंतुओं के लिए जो रंग-बदल कहलाता है, राजनीति के जंगल में वही कला ‘दलबदल’ के नाम से जानी जाती है। नेताओं की नीचता के बाद यही एक कला, कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक जैसी है। यह मौसम विज्ञान से भी बड़ी कला है! इसे ‘हृदय परिवर्तन’, ‘आत्मा की आवाज़’, ‘सेक्यूलर ताकतों एक हो जाओ’, ‘धर्म निरपेक्षता खतरे में है’, ‘राष्ट्र की अस्मिता संकट में है’,‘गणित बैठ गया है’,‘सेटिंग हो गई है’ जैसे जुमलों के गमलों में उगाया जाता है।’


फिर मेरी ओर आंख मारकर बोले, ‘कुछ लोग ईमानदारी के इसी रायते को दो-चार साल फैलाकर बड़े कमीनेपन से सत्ता का दही भी जमा लेते हैं। हें हें हें महाकवि।’
मैंने खींसे निपोरते हुए हाजी पंडित को डपटा, ‘शर्म करो हाजी! इतने घटिया काम को महिमा-मंडित कर रहे हो?’

बोले, ‘घटिया? अमां दल-बदल करने वाला नेता हमारे गरीब देश को बार-बार के चुनाव-खर्च से बचाता है। ये प्लेटफॉर्म पर भटक रहे नेताओं का RAC है, माने आगे की यात्रा कन्फर्म! जैसे फूलों के गुलदस्ते को कहीं भी रख दो, वहीं औकातानुसार खुशबू या बदबू फैलाता है, वैसे ही दलबदलू नेता सत्ता कब्ज़ाने या चलाने में योग्यतानुसार काम आता है।’


मेरे ज्ञानकुण्ड में आहुति डालते हुए हाजी ने खानसामे को चाय बना लाने का हुक़्म देते हुए कहा, ‘देखो महाकवि! दलबदल बड़े-बड़े युयुत्सु करते हैं, इसमें क्या ख़राब। ये दलबदल वाले ऐसे ‘पासे-वान’ होते हैं कि इनके ‘चिराग’ हर सरकार में जलते ही हैं। कई बार तो इस प्रक्रिया में CBI, ED जैसी सरकारी एजेंसियां तक अंजाम तक पहुंचाती हैं। और तुम तो गांधीवादी हो, इस कर्म-काण्ड को बापू तक का आशीर्वाद प्राप्त है।’
मैंने आई हुई चाय उनके सामने सरकाते हुए धिक्कारा, ‘छी:-छी: हाजी ! शर्म करो! कम से कम बापू को तो इसमें मत लपेटो!’


चाय सुड़ककर वो खिलखिलाए, ‘अमां महाकवि! तुम ही बताओ, बापू की फोटो वाले गुलाबी नोटों से तीस-तीस साल दूसरे दल से आए लोगों को सीटें बेची जाती हैं या नहीं?’ बहस में लुटे-पिटे मैंने उठ निकलने में ही भलाई समझी। ठहाका लगाते हाजी ने पीछे से ललकारा, ‘अजी रात भर दुनिया को शेर सुनाकर आए हो, हमारी भी चार लाइनें सुनते जाओ -


शर्म-ओ-लिहाज, वादे, उसूलों के बाद अब
बिकने के लिए आत्मा अंतिम सामान है
सत्ता के सौदागर को भला इस से क्या फ़रक़
इसकी दुकान है ये या उसकी दुकान है