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सरकार बन गई है पर जारी जुगाड़ है- कुमार विश्वास की व्यंग्यात्मक श्रृंखला की पहली प्रस्तुति

ख्यात कवि कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली श्रृंखला की पहली प्रस्तुति।

Dainik Bhaskar

May 21, 2018, 07:52 AM IST
डॉ. कुमार विश्वास मशहूर कवि है डॉ. कुमार विश्वास मशहूर कवि है

राजनीति धूर्तों की प्रिय शरणस्थली है, ऐसा साहित्य के अंग्रेज़ ख़लीफ़ा शेक्सपीयर का कहना है। फिर मेरी क्या मान्यता है और दिन-प्रतिदिन की राजनीति पर क्या टिप्पणी है, ये आप सब से साझा हो, ऐसा देश के सबसे बड़े और मानक समाचार-पत्र ‘दैनिक भास्कर’ की इच्छा है। पर चाहे-अनचाहे मेरी टिप्पणी से भी पहले मुझे अपने जिस बालसखा की महाज्ञानी टीप सुननी ही पड़ती है, वे हैं ‘हाजी पंडित’! चौंकिए नहीं, चूंकि ये सिर्फ निर्लिप्त और तटस्थ भाव से राजनैतिक टिप्पणी भर करते हैं, राजनीतिज्ञ नहीं हैं। इसलिए बचपन के मेरे किसी अन्य राजनीतिज्ञ मित्र की तरह न तो धोखेबाज़ हैं और न ही अवसरवादी।


‘हाजी पंडित’ के दादा मोटे-अशक्त, औलाद-व्यस्त धनिकों को अंग्रेज़ों के ज़माने में तीर्थ-यात्राएं कराते थे। हाजी पंडित के पिता बसेसर पंडित की ढांचे पर टिके छप्पर, चार कुर्सियां, एक मेज़, लोहे के बोर्ड पर छुट्टन पेंटर की कूंची द्वारा उकेरित ‘श्री बृज तीर्थ-यात्रा संस्थान’ रूपी जुगाड़-जनित व्यवस्था, हमारे कस्बे में ‘तीरथ-कंपनी’ कहलाती थी। अब आपकी जिज्ञासा का सूचकांक नेताओं की लिप्साओं की तरह हद से बाहर हो उससे पहले आता हूं उनके चौंका देने वाले नाम ‘हाजी पंडित’ पर। दरअसल अपने पिता की तीर्थ-यात्रा व्यापार में आई अचानक अरुचि के कारण, पंडित को कमसिनी में ही पिता जी का धंधा संभालना पड़ा। हाजी पंडित का पूरा नाम कृष्णगोपाल कौशिक है। प्रचंड कान्हा-भक्त मां ने दूध में घुले ललछौहें केसर के कश्मीरी रंगत वाले बालक तक का नाम भी सांवरे पर धर दिया। जवानी के दौर में गली-मुहल्ले-रिश्तेदारी में हाजी पंडित ‘कान्हा-कृष्णा-गुपाल-कीरसन-गुपाल’ जैसे सम्बोधनों से ज़रूर नवाज़े गए पर अपने मुसलमान क्लाइंट्स को सफलतापूर्वक हज करा ले आने की उनकी वार्षिक गतिविधियों ने उन्हें एक सर्वथा नया नाम दिया जो हरिद्वार के होटलों से लेकर गंगासागर की धर्मशालाओं में और दिल्ली के हज-टर्मिनल से लेकर सऊदी में भारतीय हाजियों के ख़ेमों तक में ‘हाजी पंडित’ के रूप में जाना-माना-पहचाना गया। उनकी टिप्पणियों का ज़िक्र इसलिए, क्योंकि बिला नागा सुबह दुकान खोलने जाते और शाम को दुकान मंगल कर लौटते समय हाजी पंडित मेरे घर होते ही हैं, इस बात से अप्रभावित, कि मैं घर पर हूं या नहीं हूं! मैं मिलूं, श्रीमती जी या बिटिया, वे पिताजी-माताजी के पास दांत घिसें या मेरे माली-ख़ानसामा-मैनेजर-गार्ड की कुंडली खंगालें, घर पर मौजूद कोई भी प्राणी हाजी भाई से कम-अज़-कम आधा-एक घंटा तो प्रवचन-पीड़ित होता ही है। आज सुबह आ धमके और लगे बड़बड़ाने, ‘ससुर कर्नाटक का नाटक, चुनाव बाद भी उतना ही रंगीन है, जितना पहले भाग में था, अब देखना, ये नौटंकी उन्नीस के लोकसभा आते-आते पूरे अठारह पर्वों के महाभारत में न बदल जाए तो कहना! और एक तुम हो महाकवि (मुझे लज्जित करने के लिए उनके पास मेरे लिए ‘व्याज-स्तुति’ के जो सम्बोधन हैं, उनमें महाकवि भी एक अचूक तीर है), न दक्खन देख रहे हो न दक्खिन-पंथ!

अमां लानत है इतनी भी ईमानदारी और सत्यवादिता की लत पर!’ उनकी लानत से आदतन अप्रभावित होते हुए मैंने कहा, ‘अब किसी भी दल को बहुमत न मिला तो इसमें गवर्नर साहब क्या करते हाजी भाई? आप भी खामखां ‘लोकतंत्र खतरे में है’ वाले फ़ोबिया से ग्रस्त हो!’ बोले, ‘बात तो तुम्हरी भी ठीक है यार, कर्नाटक में सत्ता की छोकरी अनैतिक निकल गयी तो लगे भाजपाई सीटी मारने और कांग्रेस क्या खा कर पत्थर मारती, जो खुद साठ साल में सौ बार लोकतंत्र और उसकी नैतिकता को चौराहे पर बिठा चुकी है! और तुम्हारे वालों की हनक-हिम्मत-औकात को इसी कांग्रेस का सौ करोड़ी अजगर खा ही गया!’ मैंने कहा, ‘अब तो बहुमत-परीक्षण भी हो गया, सुबह-सुबह काहे ज़माने भर को गरिया रहे हो?’ वे बोले, ‘बहुमत की तो पूछोई मत, बेचारे राहुल को बहू तो मिल नहीं रही, बहुमत भी जैसे-तैसे जुगाड़ से मिलता है, और दूसरा न बहू की सुनता न बहुमत की! खैर, हमें क्या? चलते हैं, ज़रा हम भी अपनी दुकान सजा लें, कर्नाटक में तो ससुर बड़े-बड़े शाहों ने खोल ही ली। तब तुम शेर सुनो महाकवि -

‘वोटर ये सोचता है कि एमएलए जो चुना,
उनका कबाड़ है या वो इनका कबाड़ है?
उन्नीस के नाटक का रिहर्सल है कर्नाटक,
सरकार बन गई है पर जारी जुगाड़ है!’
मैंने राहत की सांस ली, आप भी लीजिए!

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डॉ. कुमार विश्वास मशहूर कवि हैडॉ. कुमार विश्वास मशहूर कवि है
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