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महाभारत 2019: जब सिर पे हो चुनाव तभी धर्म ओढ़ते हैं- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला

ख्यात कवि कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली श्रृंखला की प्रस्तुति।

Danik Bhaskar | Jun 18, 2018, 11:30 AM IST
डॉ. कुमार विश्वास। डॉ. कुमार विश्वास।

ईद की शाम हाजी एक लिफ़ाफ़ा पकड़े चले आए। लिफ़ाफ़े पर दवा की दुकान का नाम देख मैंने पूछा, ‘क्या हुआ हाजी? सब ख़ैरियत?’ हाजी का पहला शब्द डकार के साथ बाहर निकला, "अमां महाकवि! क्या बताऊं! हफ़्ते भर से इफ़्तार खा-खा कर पेट का फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप बन गया है। अब जिसके यहां न जाओ, वो बुरा मान जाए।" मैंने कहा, "अमां यार ये तो अच्छी बात है। एक-दूसरे के धर्मों के त्योहार में शामिल तो होना ही चाहिए। यही तो हिन्दुस्तान की खूबसूरती है।"


हाजी ने इशारे से पानी मंगवाया और बोले, "बिल्कुल अच्छी बात है। दोस्तों की इफ़्तार में तो मज़ा आया, लेकिन सियासी इफ़्तार पार्टियों ने तो ऐसी-तैसी कर दी है। ये खाओ, वो खाओ, ऐसे खाओ, वैसे खाओ, उनके पास बैठ कर खाओ, टोपी लगा कर खाते हुए कैमरे पर खीसें निपोरकर खाओ और कुछ मना करो, तो ताने शुरू कि फलां दल की इफ़्तार पार्टी में तो आपने चार दही-बड़े खाए थे, अब हम बेचारे आम-आदमी हैं तो हमारे यहां का सरकारी इफ़्तार भी असरकारी नहीं?"

मुझे हंसी आ गई। मैंने पूछा, "अमां हाजी, ये तो उनकी मुहब्बत है।" हाजी किलसे, "अरे कोई मुहब्बत नहीं सब दिखावा है। इन सियासी पार्टियों ने इसको खेल बना दिया है। ज़्यादातर पार्टियां धर्मनिरपेक्षता का नाटक सिर्फ़ वोट-बैंक के लिए करती हैं।" मैंने कहा, "राम-राम, कैसी बातें करते हो हाजी, यानी धर्मनिरपेक्षता का कोई अस्तित्व नहीं है?"

हाजी ने तुरंत जवाब दिया, "अरे! ऐसा मैंने कब कहा और इसकी मेरे से बड़ी मिसाल क्या है, लेकिन दिल में धर्मनिरपेक्षता हो तो ठीक। जातियों के सम्मेलनों में बेशर्मी से वोट की गोलबंदी करने वाले लंपटों का धर्मनिरपेक्षता से क्या लेना-देना?" फिर तीन टैबलेट एकसाथ गटककर बोले, "महाकवि! धर्म निरपेक्षता एक मफलर की तरह होती है, जो चुनावी-मौसम देखकर कभी गले पड़ जाता है, निकम्मा होने पर सोफ़े पर पसर जाता है, सवाल पूछने पर मुंह पे बंध जाता है और अनसुना करना हो तो कानों से लिपट जाता है!" फिर आंख मारकर बोले, "मफ़लरों की ऐसी बेशर्म नौटंकियों को तुमसे बेहतर कौन जानता है?"

मैंने ताना टालकर कुरेदा, "हाजी भाई! ऐसा भी नहीं है। सब कुछ सियासत कर लिए थोड़ी होता है।" हाजी तो भरे बैठे थे, बोले, "ऐसा समझो महाकवि कि हिन्दुस्तानी धर्मनिरपेक्षता झील में नहाती वो पाकीज़ा औरत है, जिसके कपड़े सियासी दल न केवल लेकर भाग गए हैं, बल्कि उनके अपने-अपने हिसाब के झन्डे-बैनर भी बना लिए हैं। उधर वो बेचारी भीगी-भागी धर्म-निरपेक्षता, संविधान के क्लोज सर्किट कैमरों से बचने के लिए फ़र्ज़ी भाषणों के पत्ते पहने घूम रही है और अवाम इसे नया विकासवादी फैशन समझ कर ताली पीट रहा है।"

मुझे सच में मज़ा आने लगा। मैंने पूछा, "लेकिन सेकुलरिज़्म मज़बूत होगा तभी तो देश ख़ुशहाल रहेगा ना?"

हाजी बोले, "सेकुलर होने और सेकुलर होने का ढिंढोरा पीटने में अंतर है महाकवि, ये तो तुम भी जानते हो। एक बेचारे आडवाणीजी, जिन्ना की मज़ार पर फूल चढ़ाकर और उनको सेकुलर बोलकर ख़ुद अपनी पे चढ़ा आए। अब मार्गदर्शक मंडल में बैठे हाईवे से बर्फ़ हटने का इंतज़ार कर रहे हैं। और हां! तुम्हारे नवपतित गदाधारी भी तो ऐसे सवालों पर चुप हो जाते हैं। तुम्हारा सिकंदर भी तो ऐसे सिपाहियों को सेकुलर बनाता है जो धर्म की बिरयानी में तुष्टीकरण का रायता बराबर घोल सके। यही उसकी अमानत हैं! और एक तुम कमख़्त हो जो यूं तो हर धर्म को इज़्ज़त देते हो पर न टोपी पहनते हो न पहनाते हो। तो तुम्हारा नुक़सान हो गया न? तुम्हारी स्वधर्मी कमाई कसाई की दुकान के कुत्ते खा गए न? अाजकल तो तुष्टीकरण की ख़ानदानी दुकान के वारिस युवा अध्यक्षजी भी मंदिरों में जा-जा कर मीडिया को जनेऊ में लपेट कर कैप्सूल दे रहे हैं। अब देखना, 2019 तक सारे अधर्मी ऐसा ही प्रपंची धर्म बांचते नज़र आएंगे!"
‘ऐसे नहीं ये लोग कभी शर्म ओढ़ते हैं,
केवल दिखावटी ये सारे मर्म ओढ़ते हैं
वैसे नमाज़-ओ-पूजा से रिश्ता नहीं कोई
जब सिर पे हो चुनाव तभी धर्म ओढ़ते हैं’