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SECL की 78 खदानें, इनके आसपास ही चल रहे हैं सैकड़ों अवैध कोल डिपो

3 वर्ष पहले
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  • प्रदेश में हर खदान के पास कई अवैध कोल डिपो, यहां रोज डंप हो रहा चोरी का हजारों टन कोयला
  • एसईसीएल का तर्क- साइडिंग के बाहर कंपनी दोषी नहीं, पुलिस व खनिज विभाग की कार्रवाई दिखावा

 

बिलासपुर. एसईसीएल की करीब हर खदान के पास कई अवैध कोल डिपो हैं। यहां रोज हजारों टन कोयला डंप होता है, छोटे उद्योगों, ईंट भट्‌ठों आदि में इसका उपयोग किया जाता है। खदानों से निकलने वाले ट्रकों के ड्राइवर, लिंकेज में कोयला खरीदने वाले उद्योगों के प्रतिनिधियों से मिलीभगत कर डिपो संचालक चोरी का कोयला खरीदते हैं, इसकी जगह कोयले का चूरा, पत्थर, पानी मिला दिया जाता है। यही वजह है कि लिंकेज में कोयला खरीदने वाले उद्योगों तक स्तरीय कोयला नहीं पहुंच पाता। जबकि एसईसीएल की साइडिंग में खरीदी करने वाले उद्योगों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में कोयले की सैंपलिंग कर जांच की जाती है। अवैध रूप से रोज  हजारों टन कोयले की खरीदी-बिक्री पर एसईसीएल के अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि साइडिंग से कोयला निकलने के बाद कंपनी जिम्मेदार नहीं हैं। इधर, अवैध कोल डिपो पर रोक लगाने के लिए जिम्मेदार पुलिस  और खनिज विभाग सिर्फ दिखावे की कार्रवाई करते हैं। डिपो बंद करवाते जरूर हैं, लेकिन इसके कुछ दिनों बाद ही वे दोबारा खुल जाते हैं।   

 

- एसईसीएल की अंडरग्राउंड और ओपन कास्ट को मिलाकर कुल 78 खदानें हैं। समय-समय पर तकनीकी कारणों से कुछ खदानों से कोयला निकालने का काम बंद कर दिया जाता है, लेकिन करीब 75-80 खदानों से वर्षभर कोयला निकालने का काम चलता रहता है। आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2017-18 में एसईसीएल ने 144.70 मिलियन कोयले का उत्पादन किया। पिछले स्टाक को मिलाकर कुल 151.11 मिलियन टन कोयला डिस्पेच किया गया, यानी लिंकेज के माध्यम से उद्योगों को बेचा गया। एसईसीएल कोयला बेचने के लिए ऑनलाइन टेंडर जारी करता है। कोयला खरीदने वाली कंपनियों, उद्योगों को कोयला एसईसीएल की संबंधित खदान की साइडिंग से उठाना पड़ता है। खरीदी करने वाली कंपनियाें, उद्योगों के प्रतिनिधि भी यहां मौजूद रहते हैं। उनकी मौजूदगी में कोयले की सैंपलिंग यानी जांच होती है। साइडिंग से ट्रेनों की रैकों या हाइवा-ट्रकों के जरिए कोयला संबंधित जगहों के लिए रवाना कर दिया जाता है, लेकिन यहां सिस्टम की कमजोरी का फायदा कोयले की कालाबाजारी करने वाले उठाते हैं। एसईसीएल की सीमा से बाहर निकलते ही बड़े पैमाने पर चोरी का खेल शुरू होता है। चोरी की गई कोयले को अवैध कोल डिपो में डंप कर रखा जाता है। एसईसीएल की हर खदान के पास ऐसे कई अवैध कोल डिपो चल रहे हैं, जहां हर समय कई टन कोयला उपलब्ध रहता है। छोटे उद्योगों, ईंट भट्ठों सहित ईंधन के सहारे संचालित किए जा रहे कारोबार में चोरी के कोयले का उपयोग किया जाता है। 

 


ऐसे चलता है डिपो में खेल 
एसईसीएल की खदानों से उद्योगों को कोयला लिंकेज पर मिलता है। उद्योगपतियों के पास रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती इसलिए वह इन्हें डंप कर रखते हैं। कुछ उद्योगपति कोल डंप के लिए वह खनिज विभाग से अपने नाम पर लाइसेंस लेते हैं और अपने परिचित को यह काम सौंप देते हैं। परिचित इसका फायदा उठाता है। वह लिंकेज का कोयला डंप करने के नाम से डिपो में कोयले का अवैध कारोबार शुरू कर देता है। डिपो से वह जरूरत के हिसाब से उद्योग को कोयला तो भेजता है, पर यह मिलावटी होता है। उद्योगों के नाम से खदान से अच्छे ग्रेड का कोयला सप्लाई होता है। इनकी कीमत करीब 6 हजार रुपए टन होती है। वहीं चूरा व पत्थर की मिलावट वाला कोयला आधी कीमत पर मिलता है। डिपो संचालक दोनों तरह का माल रखता है। कोयला उद्योग में भेजते समय वह एक नंबर के कोयले में दो नंबर का कोयला मिला देता है। ट्रक चालक भी इसका फायदा उठाते हैं। वे उद्योगपतियों का एक नंबर का कोयला ऐसे डंपिंग डिपो में 5 रुपए किलो के हिसाब से बेच देते हैं। डिपो संचालक कोयले की जगह उसकी गाड़ी में काला पत्थर या डस्ट मिला देता है। कोयले के अवैध कारोबारियों को पकड़ने का काम पुलिस व खनिज विभाग का होता है, लेकिन कारोबारी दोनों को मिला लेता है। 

 

 

1. एसईसीएल: साइडिंग के बाद जिम्मेदारी खत्म 
खदान से निकला लिंकेज का कोयला संबंधित डिपो या फैक्ट्री में जा रहा है या नहीं, इसे लेकर एसईसीएल का रवैया बेहद गैर जिम्मेदाराना है। एसईसीएल के अधिकारी साफ कहते हैं साइडिंग से निकलने के बाद कंपनी की कोई जिम्मेदारी नहीं है। जबकि एसईसीएल का अपना विजिलेंस डिपार्टमेंट है। पुलिस और खनिज विभाग के साथ तालमेल बनाकर काम करने से कोयले की अवैध खरीदी-बिक्री पर रोक लगाई जा सकती है, इससे उद्योगों को भी सही कोयला मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा। 

 

2.खनिज विभाग: कार्रवाई के नाम पर चेतावनी
कोल डिपो के लिए खनिज विभाग ही लाइसेंस जारी करता है, इसके लिए जरूरी नियम व शर्तें होती हैं। डिपो संचालक को इसका पालन करना होता है। लाइसेंस के लिए खुद की जमीन होना जरूरी है। इसके अलावा उसे भंडारण क्षमता भी बताना पड़ता है। यहां पर्यावरण प्रदूषण विभाग का एनओसी भी जमा करना पड़ता है।  खनिज विभाग को इन डिपो में जाकर लाइसेंस की शर्तों के पालन की जांच करनी होती है। गड़बड़ी मिलने पर वह लाइसेंस निरस्त कर सकता है। लेकिन खनिज विभाग केवल खानापूर्ति की कार्रवाई करता है। 

 

जानकारी मिलने पर कार्रवाई की जाती है

इस मामले में एसईसीएल के पीआरओ नरेंद्र कुमार का कहना है कि समय समय पर कोयले के अवैध खरीदी बिक्री पर कार्रवाई की जाती है। जहां से जैसी जानकारी आती है, वहां विजिलेंस टीम जाती है। 

 

नियमों का उल्लंघन करने पर वसूला गया था जुर्माना

जिला खनिज अधिकारी आर माल्वे का कहना है कि पुलिस ने जिन डिपो को सील किया था, लाइसेंस के नियमों का उल्लंघन करने पर उनके संचालकों से जुर्माना वसूला गया था। 

उन्हें आगे किसी तरह की गड़बड़ी करने पर लाइसेंस रद्द करने की चेतावनी दी गई है। 


3. पुलिस: डिपो सील तो करती है, लेकिन वे फिर खुल जाते हैं 
अवैध रूप से कोल डिपो संचालित करने, कोयले की कालाबाजारी की जानकारी मिलने पर पुलिस सीधी कार्रवाई कर सकती है। चोरी या गड़बड़ी के संदेह पर वह खनिज विभाग से तस्दीक कराती है और एफआईआर दर्ज कर मामले को कोर्ट में पेश करती है। बिलासपुर की बात करें तो पुलिस ने रतनपुर व हिर्री क्षेत्र के 12 कोल डिपो को छापा मारकर सील कर दिया था। अफसरों ने संबंधित थानेदारों को चेतावनी दी थी कि उनके क्षेत्र में यह कारोबार फिर से शुरू हुआ तो वे जिम्मेदार होंगे। दो माह बाद अचानक सभी डिपो एक-एक कर खुलते गए। यहां पहले की तरह फिर से अवैध कोयले का कारोबार शुरू हो गया है। 

 

सारे डिपो बंद करने की लिखी थी चिट्ठी: एसपी 
एसपी आरिफ शेख का कहना है कि हमने सभी डिपो को बंद करने की माइनिंग को चिट्ठी लिखी थी। इसके बाद फिर से खुल जाना समझ से परे है। जांच करने कलेक्टर ने पुलिस व खनिज विभाग की ज्वाइंट टीम बनाई है। अब जहां भी कोयले की कालाबाजारी की सूचना मिलेगी खनिज विभाग को साथ लेकर कार्रवाई की जाएगी।

 

 

 

 

 

 

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