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सुनवाई के लिए पसंदीदा जज चुनना सीजेआई का अधिकार नहीं: शांति भूषण; लगाई याचिका

3 वर्ष पहले
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नई दिल्ली.  पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में रोस्टर सिस्टम से जुड़े मामले में एक याचिका दाखिल की। इसके जरिए उन्होंने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) की प्रशासनिक शक्तियों को लेकर कोर्ट से जानकारी मांगी है। साथ ही 'मास्टर ऑफ रोस्टर' के फैसलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि पसंदीदा बेंचों को सुनवाई के लिए केस आवंटित करने में नियमों को दरकिनार किया जा रहा है। बता दें कि जनवरी में सुप्रीम के 4 जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी ऐसे ही सवाल उठाए गए थे।

 

सीजेआई दीपक मिश्रा की बेंच में ना भेजें याचिका: भूषण

- न्यूज एजेंसी के मुताबिक, शांति भूषण ने यह याचिका अपने बेटे प्रशांत भूषण के जरिए दायर की है। प्रशांत भी सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं। सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को लिखे लेटर में उन्होंने कहा कि इस मामले की सुनवाई सीजेआई दीपक मिश्रा की बेंच में नहीं की जाए। साथ ही इसे पहले कोर्ट के शीर्ष तीन जजों के पास विचार करने के लिए भेजा जाए। इसके बाद ही उचित बेंच में सुनवाई शुरू करें।

 

सीजेआई के पास अनियंत्रित शक्तियां नहीं हो सकतीं

- शांति भूषण ने कहा है कि 'मास्टर ऑफ रोस्टर' सीजेआई के पास ऐसी अनियंत्रित शक्तियां नहीं हो सकती हैं, जिन्हें वो जजों को केस आवंटित करते वक्त मनमाने तरीके से इस्तेमाल करें। इसके लिए सीजेआई का एकाअधिकार नहीं है। ऐसे मामलों में उन्हें सीनियर जजों से मशविरा लेना चाहिए। 
- साथ ही भूषण ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के अलावा सीजेआई का नाम लिखते हुए उन्हें भी जानकारी के लिए जवाबदेह बताया है।

 

याचिका में रोस्टर प्रॉसेस की जानकारी मांगी गई

- शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट रूल, 2013 और हैंडबुक ऑन प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ ऑफिस प्रोसीजर के तहत भी जवाब मांगा। पूछा है िक क्या इनके नियमों के मुताबिक ही सीजेआई और रजिस्ट्रार मामलों को आवंटित कर रहे हैं। क्या इस प्रक्रिया में सीजेआई को 5 जजों के कॉलेजियम से बदला जा सकता है?
- इसके अलावा मामलों के आवंटन के लिए सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री और सीजेआआई के द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों की भी जानकारी दी जाए। क्या मामलों की गंभीरता के चलते इसके लिए सीनियर जजों से राय ली जाती है।

 

कुछ नेताओं के केस पसंदीदा बेंच को भेजे गए

- भूषण ने कहा कि वो इस याचिका के जरिए पसंदीदा बेंच को केस आवंटित करने और कोर्ट प्रक्रिया में बरती जा रही मनमानी को सामने ला रहे हैं। ऐसी परंपरा न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। किसी मामले को अपने हिसाब से खास बेंच में भेजने से कोर्ट के कामकाज पर उठेंगे। 
- मौजूदा प्रक्रिया को देखकर लगता है कि राजनीतिक तौर पर कुछ संवेदनशील मामलों और इनमें शामिल सत्तारूढ़ नेताओं/विपक्ष के नेताओं से जुड़े मामले चुनिंदा बेंचों के पास सुनवाई के लिए भेजे गए। इससे न्याय व्यवस्था पर असर पड़ रहा है।

 

क्या है रोस्टर सिस्टम?

- सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में रोस्टर सिस्टम के तहत केस आवंटित किए जाते हैं। मास्टर ऑफ रोस्टर के तौर पर सीजेआई को विशेषाधिकार है कि वो किसी बेंच में सुनवाई के लिए केस भेज सकते हैं।

 

जनवरी में 4 जजों ने की थी प्रेस कॉन्फ्रेंस

- 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने पहली बार अभूतपूर्व कदम उठाया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बाद दूसरे नंबर के सीनियर जज जस्टिस जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने शुक्रवार को मीडिया में 20 मिनट बात रखी। दो जज बोले, दो चुप ही रहे। 
- जस्टिस चेलमेश्वर ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए। कहा- "लोकतंत्र दांव पर है। ठीक नहीं किया तो सब खत्म हो जाएगा।" चीफ जस्टिस को दो महीने पहले लिखा 7 पेज का पत्र भी जारी किया। इसमें कहा गया है कि चीफ जस्टिस पसंद की बेंचों में केस भेजते हैं। चीफ जस्टिस पर महाभियोग के सवाल पर बोले कि यह देश तय करे। उन्होंने जज लोया की मौत के केस की सुनवाई पर भी सवाल उठाए।

 

जजों ने चीफ जस्टिस पर क्या आरोप लगाए?

1. चीफ जस्टिस ने अहम मुकदमे पसंद की बेंचों को सौंप दिए। इसका कोई तर्क नहीं था। यह सब खत्म होना चाहिए। कोर्ट में केस अलॉटमेंट की मनमानी प्रॉसेस है।

2. जस्टिस कर्णन पर दिए फैसले में हममें से दो जजों ने अप्वाइंटमेंट प्रॉसेस दोबारा देखने की जरूरत बताई थी। महाभियोग के अलावा अन्य रास्ते भी खोलने की मांग की थी।
3. कोर्ट ने कहा था कि एमओपी में देरी न हो। केस संविधान पीठ में है, तो दूसरी बेंच कैसे सुन सकती है? कॉलेजियम ने एमओपी मार्च 2017 में भेजा पर सरकार का जवाब नहीं आया। मान लें कि वही एमओपी सरकार को मंजूर है।

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