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मुख्य न्यायाधीश को संदेह से परे मानने का मतलब

मौजूदा स्थितियों में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार्य करवाना एक कठिन चुनौती है कि मुख्य न्यायाधीश एक संस्था है।

Danik Bhaskar | Apr 12, 2018, 08:32 AM IST
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असमंजस और अनिश्चितता की धुंध में घिरी न्यायपालिका की छवि को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने मुख्य न्यायाधीश को ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ के निर्णय का संपूर्ण अधिकार तो दे दिया है लेकिन, इससे संदेह का वातावरण मिटता हुआ दिख नहीं रहा है। फैसला आने के तुरंत बाद वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि यह सारा फैसला जल्दबाजी में लिया गया है और इसका प्रयास उनके पिता शांति भूषण की याचिका को बेअसर करने का है। यह फैसला अशोक पांडे की जनहित याचिका पर दिया गया है, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि कौन-सा मुकदमा किस जज के पास जाए और किस तरह संवैधानिक पीठ का गठन किया जाए इस बारे में एक दिशा-निर्देश जारी होना चाहिए।

यह विवाद उस समय से ज्यादा गरमाया हुआ है जब 12 फरवरी को न्यायमूर्ति चेलमेश्वर सहित चार वरिष्ठ जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्य न्यायाधीश के इन अधिकारों पर आपत्ति की थी। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस ने सुप्रीम कोर्ट की साख को झकझोर कर रख दिया था। तबसे अब तक सुप्रीम कोर्ट के भीतरी विवाद को निपटाने के लिए जजों के बीच कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं लेकिन, मामला जस का तस अटका हुआ है। इस बीच अगले मुख्य न्यायाधीश के नाम को लेकर भी अटकलें तेज हैं।

कुछ दिन पहले न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने के मार्ग में कोई बाधा नहीं डालेंगे। इसी के साथ उन्होंने यह आशंका भी जताई थी कि अगर बाधा डाली गई तो 12 जनवरी को उन लोगों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो आरोप लगाए थे वे सही साबित होंगे। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाम कॉलेजियम प्रणाली का शाश्वत विवाद अपनी जगह है ही। इन सबके बीच विपक्ष मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग की तैयारी भी कर रहा है।

मौजूदा स्थितियों में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार्य करवाना एक कठिन चुनौती है कि मुख्य न्यायाधीश एक संस्था है और उस पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। निश्चित तौर पर किसी संस्था के सफल संचालन के लिए उसे चलाने वाले व्यक्तियों पर भरोसा तो करना ही चाहिए लेकिन, न्याय को जरूरत से ज्यादा प्रमाणिक भी होना चाहिए। इसीलिए कहा भी गया है कि न्याय सिर्फ किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि वह होते हुए दिखाई पड़ना चाहिए।