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महिलाओं को पक्की सुरक्षा देनी है तो सत्ता-तंत्र सोच बदले

एक ऐसे आत्म-अनुशासन की जरूरत है, जो उन्हें दुष्कर्म जैसे मामले में अत्यंत संवेदना के साथ सोचने का तरीका दे पाए।

देवेन्द्रराज सुथार | Last Modified - Apr 19, 2018, 02:15 AM IST

महिलाओं को पक्की सुरक्षा देनी है तो सत्ता-तंत्र सोच बदले
कठुआ में आठ साल की बालिका के साथ दुराचार और उन्नाव में सामूहिक दुष्कर्म की घटना से हर कोई क्षुब्ध हैं। दरअसल, देशभर से मासूम बच्चियों और महिलाओं के साथ दुराचार, हत्या, एसिड फेंकने जैसी घटनाएं लगभग रोज पढ़ने को मिल जाती हैं। यहां सवाल है कि दुष्कर्म पर इतना सख्त कानून बन जाने के बावजूद वारदातें कम क्यों नहीं हो रहीं हैं? शायद इसलिए कि सिर्फ सख्त कानून बनाने से बात नहीं बनती। क्रियान्वयन सख्त करना होगा और यह पुलिस तंत्र व अदालती कामकाज का तरीका बदले बिना संभव नहीं है। यहां एक ऐसे आत्म-अनुशासन की जरूरत है, जो उन्हें दुष्कर्म जैसे मामले में अत्यंत संवेदना के साथ सोचने का तरीका दे पाए।
सवाल सरकारों की मंशा का भी है। हाल की कुछ घटनाएं बता रही हैं कि कड़ा संदेश देने वाली कार्रवाई की कमी से हालात कैसे बिगड़ते हैं। कानूनी जटिलताओं और न्याय की लेटलतीफी ने भी बहुत नुकसान पहुंचाया है। उस समाज में, जहां निर्भया कांड जैसे मामले में भी न्याय प्रक्रिया पूरी होने में पांच साल लग जाएं, तो चिंता की जानी चाहिए। शायद यही कारण है कि हम कोई सख्त संदेश नहीं दे पा रहे हैं। यह संकल्प तकनीकी उलझनों से परे जाकर अदालत और पुलिस के निचले स्तर तक यह सोच विकसित करने से पूरा होगा कि दुष्कर्म महज एक जघन्य अपराध ही नहीं, बल्कि सामाजिक बुराई है और इसके लिए नियमों की जड़ता को तोड़कर फैसले करने होंगे। इसके लिए सोच बदलनी जरूरी है। खासतौर पर वह सोच बदलनी होगी, जो सिर्फ जनता की मानसिकता के स्तर पर इससे निपटना चाहती है। असल जरूरत तो पुलिस-प्रशासन-सत्ता तंत्र की सोच बदलने की है, जिसका बदलाव समाज को आश्वस्त कर पाएगा। उसे सुरक्षा बोध दे पाएगा। वरना, हम रात को निकलना बंद भी कर दें, तो क्या गारंटी है कि दिन में महिलाओं के साथ यह सब नहीं होगा? हमारी 125 करोड़ की जनसंख्या में लगभग 58.6 करोड़ की आबादी के प्रति अब राजनीतिक शक्तियों और आम जनता को जागृत होना होगा और नारी के सम्मान के लिए कमर कसनी होगी।
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