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मंडे पॉजिटिव: जान भले ही चली जाए लेकिन, अपनी आन न जाने पाए

स्कूल, काॅलेज नहीं गई फिर निरक्षर होकर भी महिलाओं के स्वाभिमान की रक्षा के लिए संगठन बनाया, अब अभिनेत्री बनीं

चण्डीदत्त शुक्ल | Last Modified - Aug 13, 2018, 12:01 AM IST

मंडे पॉजिटिव: जान भले ही चली जाए लेकिन, अपनी आन न जाने पाए

मेरा जन्म ज़िला बांदा के कैरी गांव में हुआ था। परिवार में मेरे अलावा, दो भाई और दो बहनें हैं। हमारा गांव पिछड़े इलाके का है, वहां लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई के लिए स्कूल नहीं भेजा जाता था। मुझे अक्षर, कहानियों, कॉपी-किताब का शौक था। अब स्कूल नहीं नसीब हुआ तो क्या, खुद ही पढ़ती-लिखती थी। कलम नहीं थी तो कोयला हाथ में ले लिया। कॉपी और ब्लैकबोर्ड की जगह घर की दीवारों और ज़मीन का सहारा लिया। जो थोड़ा-बहुत लिखना सीख पाई, वो ऐसे ही संभव हुआ। यहां तो लोग चाहते हैं कि बेटियां जन्म न लें, कम से कम मेरे परिवार ने बेटी को जन्म तो लेने दिया।


12 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई। जब हम ससुराल आए तो पता चला कि हालात कितने ख़राब हैं। परम्परा थी कि पहले पुरुष खाना खा लें, बाद में बचा-खुचा महिलाओं के हिस्से में आएगा। सिर ढंककर रखो और सिर झुकाकर रहो- ये परम्परा थी। इतनी कड़ाई से पहली बार ससुराल रौली कल्याणपुर में पाला पड़ा। वैसे, तकरीबन पूरे बुंदेलखंड में तब ऐसी ही हालत थी। इतनी कड़ाई बर्दाश्त करना मेरे बस की बात न थी। मैंने विरोध जाहिर करना शुरू किया। सास जो कुछ मना करतीं, मैं जान-बूझकर वो ज़रूर करती। मैंने देखा कि आसपास की औरतें भी जुल्म की शिकार हैं। मैंने दो-चार महिलाओं को समझाया कि बड़ों का सम्मान करो, लेकिन घुट-घुटकर न रहो। संगठन बनाने का उद्देश्य यही था कि ये सास लोग बात न मानने पर मारेंगी-पीटेंगी तो उन्हें भी मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। हालांकि, इसकी नौबत ही न आई। सच कहूं तो स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक व्यक्तिगत लड़ाई मैंने शुरू की थी, जो जल्द ही सामाजिक आंदोलन का रूप लेने लगी।


एक बार ससुराल में एक आदमी पत्नी की पिटाई कर रहा था। मैंने मना किया तो उसने मुझे गाली दी। फिर क्या था, हम सब महिलाओं ने उसकी जमकर धुलाई की। रातोंरात पूरे इलाके में ख़बर फैल गई कि औरतें अब अत्याचार बर्दाश्त नहीं करेंगी। जाहिर है कि मर्दों को यह बर्दाश्त नहीं होने वाला था। कुछ ने अपने घर की औरतों को समझाया भी कि संपत के साथ न रहो, वो बिगाड़ देगी। उन महिलाओं ने हां-हूं तो की, लेकिन मन से मेरे ही साथ रहीं। संगठन में सदैव शक्ति होती है, इसलिए सभी खुद को ताकतवर महसूस कर रही थीं। इसके अलावा, हम सभी अपने घरों में थीं। हम न कोई मीटिंग कर रही थीं, न सड़क पर आंदोलन। दो साल में 10 हज़ार महिलाएं हमारे उस संगठन से जुड़ गईं, जिसका कोई ‘ऑन पेपर’ अस्तित्व नहीं था। जब कभी पता चलता कि महिलाओं के विरुद्ध किसी ने भी कोई आपत्तिजनक हरकत की है तो जितनी भी महिलाएं आसपास होतीं, अपराधी पर धावा बोल देतीं। सहमति बन गई थी कि घर का काम करेंगे, लेकिन किसी का दबाव नहीं बर्दाश्त करेंगे।


साल भर बाद हममें से कुछ महिलाओं ने तय किया कि यात्रा पर निकलेंगे। हम सब बगैर टिकट लिए ट्रेन से लखनऊ चल दीं। महिला अधिकारों को लेकर हम सबने नारेबाज़ी की। लखनऊ में हमारे दल पर मीडिया की नज़र पड़ी और फिर पहली बार ख़बरों में नारी सशक्तीकरण की प्रतीक, बांदा की महिलाओं का ज़िक्र हुआ। यात्रा पूरी हुई और सब महिलाओं में नया जोश भर गया कि हम घर से बाहर निकल सकती हैं। हमने संगठन को व्यावहारिक रूप देने का फैसला किया। हम सामाजिक कार्यों के लिए अधिकारियों से मुलाकात करने लगे। एक बार सबने तय किया कि एक ही रंग की साड़ी पहनेंगी। हमने 100-100 रुपए चंदा इकट्‌ठा किया और दुकानदार के पास पहुंचे। उससे एक ही रंग की साड़ियां दिखाने के लिए कहा। वो लाल रंग लाया, लगा कि ये तो मुलायम सिंह यादव की पार्टी का रंग हो जाएगा। नीले में बसपा की तो सफेद में ब्रह्माकुमारी की झलक मिलती थी। अंततः गुलाबी साड़ी पर सब तैयार हो गए। गुलाबी रंग हमने पहले से तय करके नहीं चुना था, न ही अपने संगठन का नाम गुलाबी गैंग रखा था। ये सब इत्तेफाक है।


हमारे गांव के पास सड़क टूटी हुई थी। हम डीएम को ज्ञापन देने गए। उन्होंने हमें बदतमीज कह दिया। हमें भी गुस्सा आ गया। हमने उन्हें कुर्सी से खींच लिया और टूटी सड़क तक लेकर आए। उनकी समझ में भी आ गया। तुरंत सड़क बनवाने का ऑर्डर दे दिया। एक दारोगा ने एक महिला के पति को बिना एफआईआर के 11 दिन से लॉकअप में पकड़कर बंद कर रखा था। मैंने कहा कि अपराध है तो चालान करो। उन्होंने जवाब देने की जगह डंडा उठा लिया। हमने वो डंडा छीनकर उन्हें ही धुन दिया। मुझ पर मामला भी दर्ज हुआ, लेकिन मैं नहीं डरी। अगर मन में लालच नहीं है तो कोई रोक नहीं सकता। औरत-मर्द में फ़र्क करने वाले अनपढ़ों से भी गए गुज़रे हैं। बहुत-सी औरतें ज़ुल्म सहती रहती हैं और सोचती हैं कि पति छोड़ देगा। छोड़ना है तो छोड़ दे। तुम्हारे हाथ-पांव नहीं हैं क्या? मन की हार से बड़ी और कोई चीज़ नहीं है।


मैं बेहद ख़ुश हूं कि आज पूरे देश में लाखों महिलाएं गुलाबी गैंग से जुड़ चुकी हैं। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान आदि में हमारी पांच लाख सदस्य हैं। पुलिस-प्रशासन को पता है कि गुलाबी गैंग की औरतें अपने और समाज के हक में खड़ी हैं, इसलिए सब हमारा सम्मान करते हैं। अनुभव सिन्हा ने बगैर हमसे बात किए माधुरी दीक्षित और जूही चावला के साथ हमारे जीवन व संगठन पर काल्पनिक फ़िल्म बना ली। अगर हमसे सच्ची कहानी जानी होती तो पूरे देश में स्त्री सशक्तीकरण की बयार चल रही होती। ख़ैर, अब तो मैं ख़ुद इरशाद ख़ान की फ़िल्म ‘जाको राखे साइयां’ से बतौर अदाकारा एक और आंदोलन की शुरुआत कर रही हूं। अब बॉलीवुड में भी नारी सशक्तीकरण का झंडा बुलंद करने की योजना है।


महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली समाज सेविका संपत पाल ने मुंबई में चण्डीदत्त शुक्ल को बताया।)


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