18 नृत्यांगनाओं ने कथक में रची राधा-कृष्ण की होली
\\\"मेरा मुर्शिद खेले होरी...\\\'
सिटी रिपोर्टर. इंदौर
इन नृत्यांगनाओं की देहभाषा में होली की उमंग थी...भावों में कई रंग थे, मुद्राओं में ऊर्जा थी, उत्साह था...इन 18 नृत्यांगनाओं ने अपने कथक में कान्हा और राधा की होली भी दिखाई। बड़ी सुंदरता से वह पूरा प्रसंग रचा जब पूरे गांव से बचती-बचाती राधा सिर्फ अपने कान्हा के हाथों रंगी जाना चाहती थी। रंग न डालने के लिए कभी किसी की मनुहार करती तो कभी किसी को खरी खोटी सुनाती राधारानी किसी तरह कान्हा तक पहुंच भी गई... पर कान्हा के सलोने रूप पर ऐसी मोहित हुई कि रंग की मटकी कान्हा पर उड़ेलने के बजाय खुद ही पर उलट दी। प्रीतमलाल दुआ सभागार में संस्था नृत्यांजलि की ओर से गुरुवार को कराए गए इस कार्यक्रम में कवित्त और गत भी प्रस्तुत की गई। गीत \\\"मोहे रंग दो लाल...\\\' और \\\"होली आई रे पिया जी रे देस रे...\\\' पर भी कथक किया। होली के मशहूर गीत अरे जा रे हट नटखट पर भी कथक किया। इसमें तीन लड़कियों को युवक रूप में मंच पर लाकर उनकी चुहलबाज़ी मंच पर दिखाई गई। सूफी कथक इस कार्यक्रम की सबसे अनूठी पेशकश था। \\\'मेरा मुर्शिद खेले होरी...\\\' बंदिश पर सूफी कथक किया।