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दो साल में बन गए बड़े निजी अस्पताल, सरकारी सुस्ती ऐसी कि एमटीएच सात साल में भी अधूरा

एक वर्ष पहले
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दो साल पहले बनना शुरू हुए शंकरा आई हॉस्पिटल में कुछ दिन पहले स्वास्थ्य सेवाएं भी शुरू हो चुकी हैं, जबकि 2013 में बनना शुरू हुआ सरकारी एमटीएच अस्पताल अब तक पूरा नहीं हुआ। यही हाल सुपर स्पेशलिटी व जिला अस्पताल का है। जिला अस्पताल में तो सुस्ती का आलम ऐसा
रहा कि 17 महीने में इसकी पुरानी बिल्डिंग ही नहीं तोड़ी जा सकी। बनेगा कब, शुरू कब होगा, इसकी तो कोई बात भी नहीं करता।

एमवाय बर्न यूनिट : छह महीने में तैयार होना थी, नौ महीने बाद भी काम पूरा नहीं

एमवायएच में पुरानी कैजुअल्टी के ऊपर नई बर्न यूनिट बनाई जा रही है। इस योजना पर लंबे समय से काम चल रहा है। मार्च 2019 में सरकार ने बजट दिया। अफसरों का दावा था कि यह छह महीने में बनकर तैयार हो जाएगी, लेकिन नौ महीने बाद भी काम पूरा नहीं हो पाया है। अब इस साल अप्रैल-मई तक इसके बनने की संभावना है।

सुपर स्पेशलिटी : जमीन के विवाद
में काम में बढ़ती जा रही है लेटलतीफी


यही स्थिति ढक्कनवाला कुआं स्थित सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल के साथ भी है। निर्माण एजेंसी ने तय समय पर काम किया, लेकिन एनसीसी के साथ जमीन विवाद नहीं सुलझ पाने के कारण 240 करोड़ की लागत से बन रहे इस अस्पताल के बनने में देरी हुई। अब एनसीसी की जमीन मिल चुकी है, लिहाजा अफसर कह रहे हैं कि मई में पूरा कर देंगे। हालांकि सिविल वर्क होने के बाद भी स्टॉफ की नियुक्ति और संसाधन जुटाना चुनौती रहेगा। इसका निर्माण अप्रैल 2018 में शुरू हुआ था, दिसंबर 2019 के पहले इसे पूरा करना था।

एमटीएच : 40 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी जनता को पूरा लाभ नहीं मिल रहा


नवंबर 2013 में एमटीएच महिला अस्पताल का काम शुरू किया गया। प्लानिंग में इतने फेरबदल हुए कि कई बार बेड की संख्या बदलती गई। देरी का असर लागत पर भी पड़ा। अब बिल्डिंग बनकर तैयार है, लेकिन सेवाएं शुरू करने के लिए अस्पताल पूरी तरह तैयार नहीं है। छह साल बाद भी जनता को इसका लाभ नहीं मिल रहा।

जिला अस्पताल : पांच साल से यह तय नहीं कर पाए कि कितने बेड का बनाएं


10 साल की जद्दोजहद के बाद जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग बनाने की मंजूरी मिली थी। 40 करोड़ की लागत से 300 बेड की क्षमता का नया अस्पताल बनाया जाना है। सितंबर 2018 में इसका शिलान्यास तत्कालीन केंद्रीय मंत्री ने किया था, लेकिन
अस्पताल का काम शुरू नहीं हो सका। पांच साल तो विभाग ने इस बहस में गुजार दिए कि इसे 100 बेड का बनाया जाए या 300 बेड की क्षमता का। यह
फाइनल हुआ तो अब जो काम चल रहा है, उसमें कोई गति नहीं दिखती।


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