बीजापुर: बच्चों की पढ़ाई के लिए पूजा स्थलों को स्कूल बना दिया

News - स्कूल भवन नहीं थे, तो अधिकारी ने ग्रामीणों की मदद से वैकल्पिक स्थानों पर पढ़ाई शुरू करा दी भास्कर न्यूज | बीजापुर...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 08:00 AM IST
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स्कूल भवन नहीं थे, तो अधिकारी ने ग्रामीणों की मदद से वैकल्पिक स्थानों पर पढ़ाई शुरू करा दी

भास्कर न्यूज | बीजापुर

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में मौजूद पांच गांवों में बच्चों की पढ़ाई शुरू कराने का जिम्मा गांववासियों ने चुनौती की तरह लिया। इसके लिए उन्होंने देवगुड़ी (झोपड़ीनुमा पूजा स्थल) को ज्ञानगुड़ी (स्कूल) में बदल दिया है। गांववालों की निगरानी में घरों में तो कहीं पेड़ों के नीचे ये छोटे स्कूल खुल गए हैं।

दरअसल नक्सलवाद के चलते केरपे संकुल के पांच गांवों में पिछले 14 वर्षों से स्कूल बंद पड़े थे। अब फरसनार, करकावाडा, गोंडनुगुर, दुधेपल्ली और केरपे में स्कूल की घंटी फिर से बजने लगी है। करकावाडा और गोंडनुगुर गांव में स्कूल देवगुड़ी में खोले गए हैं। बस्तर संभाग में यह संभवत: पहला मामला है कि स्कूल के लिए भवन नहीं मिलने पर गांव की देवगुड़ियों में बच्चों के लिए पढ़ने-लिखने की व्यवस्था की गई है। गांव के प्रमुख हिड़मा जोगा ने बताया कि यहां के 56 गांवों में 13 हजार से ज्यादा आबादी है। इनमें करीब ढाई हजार बच्चे पढ़ाई से दूर थे। हम उन्हें हर हाल में पढ़ाना चाहते हैं। अब तक हमने इलाके में गोलियों-धमाकों की आवाजें सुनी हंै, पर अब स्कूल की घंटी सुनाई देती है। इस अभियान में बड़ा योगदान खंड शिक्षा अधिकारी सुखराम चिंतूर का भी है। चिंतूर ने ही करकावाडा और गोंडनुगुर में स्कूल के लिए भवन न मिलने पर वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर देवगुड़ियों में स्कूल खोलने का प्रस्ताव गांववासियों के सामने रखा था।

बीजापुर के जिला शिक्षा अधिकारी केके उदेष ने बताया कि 2005 में नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुडूम की शरुआत हुई थी। इसके बाद नक्सली हिंसा को देखते हुए 270 स्कूलों को बंद किया गया था, जिनमें 233 प्राथमिक शाला तथा 37 माध्यमिक स्कूल बंद पड़े हैं। इनमें से 12 स्कूल ही खुल पाए। बाकी स्कूलों को खोलने के लिए गांववालों के साथ यह अभियान शुरू किया गया है। वहीं चिंतूर के मुताबिक देवगुड़ी में स्कूल खोलने का यह पहला मामला है और इससे यह स्पष्ट होता है कि ग्रामीण शिक्षा को लेकर बेहद जागरूक हैं। हमारी कोशिश रहेगी कि स्कूलों में घंटियों की आवाज फिर बंद न हो।

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