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वाहन-बीमा कंपनियों के विवाद में अटका क्लेम

एक वर्ष पहले
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केस-1 एमपी नगर स्थित गौतम नगर निवासी राम की गाड़ी को हबीबगंज स्टेशन एरिया के पास रॉन्ग साइट से आ रहे वाहन ने टक्कर मार दी। राम ने क्लेम किया। लेकिन उनसे कहा गया कि कंपनी से रिपेयरिंग कराकर बिल जमा करवा देना। वाहन में लगभग 67 हजार 412 रुपए का खर्चा आया। बीमा कंपनी को जब क्लेम की फाइल सबमिट करने के लिए दी तो उसने मना कर दिया, जबकि वाहन बीमा कवर के दायरे में था। मामला उपभोक्ता फोरम में पहुंच गया, तब कहीं जाकर कंपनी से रकम मिल पाई।

मंदी के इस दौर में बीमा कंपनियों ने अपने एजेंट्स को ज्यादा से ज्यादा वाहनों का बीमा करने का टारगेट दे रखा है। यह लक्ष्य उन्हें इसी महीने मार्च 2020 तक पूरा करना है। लेकिन इसके विपरीत वाहन मालिक को दुर्घटना होने पर क्लेम न देने में कई कंपनियां अपने वायदे से पलटती नजर आ रही हैं। जिससे आम जन को क्लेम के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इस प्रक्रिया में उसका समय के साथ ही पैसा बर्बाद हो रहा है। लेकिन क्लेम के लिए कंपनी की शर्तों का दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।

शहर में लगभग 40 बीमा कंपनियां हैं। इनके पांच हजार से अधिक एजेंट शहर में सक्रिय हैं। ज्यादातर वाहन डीलर्स ने बीमा कंपनियों को फिक्स कर रखा है। इसके बदले वाहन विक्रेता कंपनी से कमीशन लेते हैं। लेकिन इसका लाभ ग्राहकों को नहीं मिल पाता है। ग्राहक को इंश्योरेंस के पूरे पैसे चुकाने होते हैं।

केस-2 रातीबड़ निवासी मुकेश नायर की फोर व्हीलर गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। विदिशा रोड पर एक मिनी ट्रक ने उनके वाहन को टक्कर मार दी। गाड़ी के आगे का ढांचा टूट गया था। उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट करने के साथ ही कंपनी में गाड़ी को रिपेयरिंग के लिए दिया। लेकिन बीमा कंपनी ने जांच के नाम पर दो महीने निकाल दिए। बाद में उपभोक्ता फोरम मेंे केस फाइल करने की बात पर कंपनी के अफसर सरेंडर हुए। उन्होंने लगभग 92 हजार रुपए का हर्जाना मुकेश को दिया।

केस-3 जानकी नगर निवासी वर्षा खरे ने जुलाई 2019 में एक फोर व्हीलर वाहन खरीदा था। इस दौरान वर्षा ने वाहन का बीमा एक सरकारी कंपनी से कराने की बात डीलर सेे कही। लेकिन डीलर ने उनका बीमा एक निजी कंपनी के यहां करा दिया। 25 जनवरी को उनके वाहन का एक्सीडेंट हो गया, जिसमें उनकी गाड़ी का गेट टूट गया। अब बीमा कंपनी इसे चालक की लापरवाही मानकर क्लेम देने में टालमटोल कर रही है। ऐसे में वर्षा के पास उपभोक्ता फोरम में जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

आम आदमी नया वाहन लेकर उस समय परेशान हो जाता है, जब वाहन दुर्घटना के दौरान बीमा कंपनी क्लेम देने में आनाकानी करती है। पिछलेे एक साल में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है। ऐसे में पीड़ित के पास उपभोक्ता फोरम की शरण में जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता है। फोरम ने भी इन मामलों में सख्ती दिखाना शुरू कर दिया है। वह पीड़ित को बीमे की राशि सहित मानसिक कष्ट और आने-जाने का खर्च भी कंपनी से ही दिलवा रहा है। इससे वाहन मालिकों को राहत और बीमा कंपनियों पर नकेल डल रही है।

ऐसे समझें बीमे का गणित

नया वाहन खरीदते समय ग्राहक को दो पहिया वाहन में पांच साल का इंश्योरेंस कराना अनिवार्य है। इसमें एक साल का फर्स्ट पार्टी बीमा और चार साल का थर्ड पार्टी बीमा होता है। इसके साथ ही नए चार पहिया वाहन में चार साल का बीमा अनिवार्य रूप से किया जाता है। इसमें तीन साल थर्ड पार्टी और एक साल का फर्स्ट पार्टी बीमा होता है। वाहन मालिक चाहे तो बीमे की समय अवधि को बढ़वा सकता है। यहां भी सबसे बड़ा पेंच यह है कि ग्राहक अपनी मनपसंद कंपनी से बीमा नहीं करा सकता। ऐसे में जब किसी का वाहन दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हो जाता है तो उसके मालिक को क्लेम पाने में मुश्किल का सामना करना पड़ता है।

ऐसे मामले बढ़ने लगे हैं

बाजार में बीमा कंपनियों का जाल फैला है। कोई भी वाहन खरीददार अपनी मनपसंद कंपनी से बीमा नहीं करा सकता। इसका परिणाम यह होता है कि उसे क्लेम के लिए डीलर की मदद लगती है। इनके बीच कमीशन फिक्स होने से ग्राहक को समय पर बीमा का भुगतान नहीं मिल पाता है। उपभोक्ता फोरम में ऐसे मामले बढ़ने लगे हैं। इसका कारण लोगों की जागरूकता है।
आदित्य मिश्रा, अधिवक्ता, उपभोक्ता फोरम
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