कोरोना का असर: आज महिलाएं घर से ही करेंगी गणगौर की पूजा

Raisen News - चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को सौभाग्यवती महिलाएं अपने अखंड सुहाग की प्राप्ति के लिए एवं कुंवारी कन्याएं वर...

Mar 27, 2020, 08:16 AM IST
Raisen News - mp news corona effect today women will worship gangaur from home

चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को सौभाग्यवती महिलाएं अपने अखंड सुहाग की प्राप्ति के लिए एवं कुंवारी कन्याएं वर प्राप्ति के लिए गणगौर का व्रत करती हैं यह व्रत चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होकर चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीय तक रहता है।

चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को यह व्रत किया जाता है इस व्रत में भगवान शिव एवं माता पार्वती का पूजन किया जाता है। शिव और पार्वती के रूप में ईसर गौर( ईश्वर गौरी) की पूजा का विधान विशेष रूप से राजस्थान में ईसर गणगौर के महोत्सव रूप में बड़ी ही श्रद्धा से संपन्न होता है। इस व्रत को गौर पूजा गणगौर सौभाग्य तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। सौभाग्यवती महिलाएं अपने अखंड सुहाग के लिए और कुंवारी कन्या सुंदर वर प्राप्ति के लिए यह व्रत किया जाता है धर्माधिकारी पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि इस वर्ष गणगौर का व्रत 27 मार्च शुक्रवार को किया जाएगा।

धर्मसिंधु निर्णय सिंधु और देवी पुराण में भी गणगौर व्रत का प्रमाण मिलता है। गणगौर के रूप में भगवान शिव एवं माता पार्वती का पूजन किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष ने पूर्व काल में जिस सौभाग्य रस का पान किया था। उसके अंश से एक कन्या उत्पन्न हुई, जो सती के नाम से प्रसिद्ध हुई। अपने सौंदर्य माधुर्य तथा ललित्य के कारण ललिता भी इनका नाम है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को विश्व परमात्मा भगवान शंकर के साथ इनका विवाह हुआ था। इस दिन उत्तम सौभाग्य तथा भगवान शंकर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सौभाग्य सायन नामक व्रत किया जाता है। वह व्रत संपूर्ण मनोरथ को पूर्ण करने वाला होता है। गणगौर के व्रत को महिलाएं बड़ी श्रद्धा भक्ति से और उमंग के साथ करती हैं।

तालाब की मिट्टी से बनाई जाती है प्रतिमा

शास्त्रों के अनुसार बताया गया है कि होलिका दहन की भस्म और तालाब की मिट्टी से ईसर गोरकी प्रतिमाएं बनाई जाती है और इन्हें वस्त्र अलंकारों से सुसज्जित कर घर के चौक में स्थापित करके श्रद्धा पूर्वक उनकी पूजा की जाती है। महिलाओं के साथ कुंवारी कन्याएं भी पूजन करती हैं। कई दिन पूर्व पूजा के लिए हरी दूर्वा पुष्प और जल लाने के लिए महिलाएं अपनी टोलियां बनाकर प्रतिदिन सुबह मधुर गीत गाते हुए निकलती हैं और किसी उद्यान में तालाब में सरोवर उनसे जल भरकर आती है और गणगौर का पूजन करती हैं। चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को प्रातः काल की पूजा के बाद तालाब सरोवर बावड़ी नदी में विसर्जन करती हैं कुछ महिलाएं 1 दिन बाद विसर्जन करती हैं। गणगौर की विदाई अथवा विसर्जन का दृश्य देखने योग होता है। उस समय कन्याएं एवं विवाहित स्त्रियां वस्त्र आभूषणों को धारण कर सुसज्जित होकर भाग लेती है और सुंदर गीत-गाती हुई ईसर गणगौर की प्रतिमाओं को जल में विसर्जन करने का विधान है। लेकिन लॉक डाउन को देखते हुए घरों में विर्सजन करने की बात कही जा रही है।

बाजार में गणगौर पूजन के लिए रखी गणगौर।

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