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स्क्रीन शेयरिंग एप डाउनलोड कराकर धाेखाधड़ी

एक वर्ष पहले
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साइबर अपराधियों ने अब वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी), यूपीआई पर डेबिट लिंक भेजने के साथ ही ठगी का ट्रेंड भी चेंज कर दिया है। अब अपराधी तत्व लोगों को इनाम या ऑफर का झांसा देकर उनके स्मार्टफोन में स्क्रीन शेयरिंग एप डाउनलोड कराकर ठग रहे हैं। राज्य साइबर पुलिस के पास एक सप्ताह में ही इस प्रकार धोखाधड़ी करने की आठ से अधिक शिकायतें पहुंची हैं।

स्क्रीन शेयरिंग एप में एनीडेस्क, टीम व्यूअर, क्विक सपोर्ट और एयरड्रॉयड जैसे एप शामिल होते हैं। शातिर ठग स्वयं को किसी नामी-गिरामी कंपनी का कर्मचारी बताते हुए आकर्षक इनाम या डिस्काउंट का झांसा देते हैं। इसके बाद लोगों के मोबाइल पर इन एप को डाउनलोड करने के लिए लिंक भेजी जाती है या फिर प्ले स्टोर में जाकर डाउनलोड करने के लिए कहा जाता है, ताकि व्यक्ति को विश्वास हो जाए। ये एप डाउनलोड करते ही एक पांच अंको का कोड जनरेट होता है, जिसे ठग लोगों से पूछ लेते हैं। इस कोड को ठग अपने मोबाइल में डाल लेते हैं। ऐसे में दोनों मोबाइल आपस में पेयर हो जाते हैं और साइबर ठग उस व्यक्ति का मोबाइल एक्सेस कर सकते हैं। इस आधार पर बैंक डिटेल और यूपीआई तक को ठग ऑपरेट कर लेते हैं। एक शिकायत के आधार पर डीबी स्टार टीम ने मामले की पड़ताल की, तो खुलासा हुआ कि इस तरह से पिछले एक सप्ताह में शहर के लोगों के खातों से दस लाख रुपए तक उड़ा लिए गए हैं। चूंकि सारे ट्रांजेक्शन व्यक्ति के स्वयं के मोबाइल से होना दर्शाया जाता है, ऐसे में ठगों को ट्रेस करने में भी खासी परेशानी होती है। जिन खातों में ये पैसा ट्रांसफर किया गया है, सिर्फ उक्त लेन-देन के आधार पर ही ठगों को ट्रेस किया जा सकता है।

सांकेतिक चित्र

40 हजार से साढ़े छह लाख तक निकाले

राज्य साइबर पुलिस के पास 40 हजार रुपए से लेकर अधिकतम साढ़े छह लाख रुपए तक ट्रांसफर करने की शिकायतें पहुंची हैं। ठगी का यह नया तरीका है, इस कारण पुलिस इन ठगों को ट्रेस करने के लिए रास्ता तलाश रही है। अब और लोग इस तरह की ठगी का शिकार न हों, इस कारण यह नई एडवाइजरी जारी की गई है।

ऐसे बचें ठगी से

}अनजान के कहने पर कोई भी रिमोट एक्सेस मोबाइल एप डाउनलोड न करें।

}अन्य किसी एप को डाउनलोड करने से पहले उसकी उपयोगिता की जानकारी जरूर प्राप्त कर लें।

}अपने बैंक, डेबिट-क्रेडिट कार्ड, ई-वॉलेट की जानकारी एवं मोबाइल पर आने वाले वन टाइम पासवर्ड या वेरीफिकेशन कोड को किसी से शेयर करने से बचें।

ठगी के कई मामले आए हैं सामने

राजधानी समेत प्रदेश के अन्य शहरों में स्क्रीन शेयरिंग के जरिए धोखाधड़ी करने का नया तरीका सामने आया है। एक सप्ताह में ही रिमोट एक्सेस एप से ठगी के आधा दर्जन से अधिक मामले हमारे पास आए हैं। इन एप के जरिए शातिर ठग लोगों के मोबाइल ऑपरेट तक करने के अधिकार ले लेते हैं और बाद में उनके खातों से रकम उड़ा देते हैं। इसको देखते हुए हमने एडवाइजरी जारी की है। संदेश जैन, एएसपी साइबर क्राइम भोपाल

1- एनीडेस्क-यह रिमोट डेस्कटॉप सॉफ्टवेयर टूल है। इस एप के जरिए शातिर ठग आपके मोबाइल को एक्सेस कर लेता है और फिर किसी भी जगह से आपके फोन की जानकारी डिलीट या कॉपी कर सकता है। बैंकिंग डाटा समेत अन्य जानकारी चुरा सकता है। एप डाउनलोड होने पर एक कोड जेनरेट होता है, जिसे किसी दूसरे मोबाइल में डालकर आपके मोबाइल को ऑपरेट किया जा सकता है।

2- क्विक सपोर्ट-यह एप भी रिमोट सॉफ्टवेयर टूल है। इसमें किसी भी मोबाइल, कंप्यूटर या लैपटॉप को आपस में कनेक्ट किया जा सकता है। एक बार कनेक्शन होने के बाद दोनों डिवाइस के बीच महत्वपूर्ण व गोपनीय डाटा ट्रांसफर भी किया जा सकता है। शातिर ठग इस एप का इस्तेमाल यूपीआई के जरिए ठगी में करते हैं। वे व्यक्ति के यूपीआई अकाउंट को ऑपरेट कर अपने खातों में पैसा ट्रांसफर कर लेते हैं।

3- एयरड्रॉयड-इस एप के जरिए किसी भी दूसरे मोबाइल में आ रहे नोटिफिकेशन, एसएमएस को देखा जा सकता है। इस एप की विशेषता यह है कि ये मिररिंग की तर्ज पर काम करता है यानी कि एक डिवाइस में हो रहे किसी भी एप या डाटा में फेरबदल को दूसरे मोबाइल पर देखा जा सकता है। शातिर ठग से एप डाउनलोड कराकर पहले यूजर की गतिविधियां देखते हैं और बाद में मौका मिलते ही अकाउंट साफ कर देते हैं।

4- टीम व्यूअर-इस एप के जरिए किसी भी दूसरे मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर को ऑपरेट किया जा सकता है। एक बार डाउनलोड हो जाने के बाद इस एप के जरिए दूसरे मोबाइल में डाटा ट्रांसफर भी हो सकता है। ये एप डाउनलोड कराने के बाद शातिर ठग एक रुपए का ट्रांजक्शन करने के लिए कहते हैं। इस ट्रांजक्शन के दौरान वे अपने मोबाइल पर पासवर्ड देख लेते हैं और फिर अपने खाते में बाकी रकम ट्रांसफर कर लेते हैं।

_photocaption_ऐसे काम करते हैं ये एप
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